Friday, June 3, 2016

सत्यशोधक

आइये समाज में फैले कु्छ षड्यंत्रों पर प्रकाश डालें :-

अर्धसत्य ---फलां फलां तेल में कोलेस्ट्रोल नहीं होता है!

पूर्णसत्य --- किसी भी तेल में कोलेस्ट्रोल नहीं होता ये केवल यकृत में बनता है । ✅

अर्धसत्य ---सोयाबीन में भरपूर प्रोटीन होता है !

पूर्णसत्य---सोयाबीन सूअर का आहार है मनुष्य के खाने लायक नहीं है! भारत में अन्न की कमी नहीं है, इसे सूअर आसानी से पचा सकता है, मनुष्य नही ! जिन देशों में 8 -9 महीने ठण्ड रहती है वहां सोयाबीन जैसे आहार चलते है । ✅

अर्धसत्य---घी पचने में भारी होता है

पूर्णसत्य---बुढ़ापे में मस्तिष्क, आँतों और संधियों (joints) में रूखापन आने लगता है, इसलिए घी खाना बहुत जरुरी होता है !और भारत में घी का अर्थ देशी गाय के घी से ही होता है । ✅

अर्धसत्य---घी खाने से मोटापा बढ़ता है !

पूर्णसत्य---(षड्यंत्र प्रचार ) ताकि लोग घी खाना बंद कर दें और अधिक से अधिक गाय मांस की मंडियों तक पहुंचे, जो व्यक्ति पहले पतला हो और बाद में मोटा हो जाये वह घी खाने से पतला हो जाता है✅

अर्धसत्य---घी ह्रदय के लिए
               हानिकारक है !

पूर्णसत्य---देशी गाय का घी हृदय के लिए अमृत है,  पंचगव्य में इसका स्थान है । ✅

अर्धसत्य---डेयरी उद्योग दुग्ध
               उद्योग है !

पूर्णसत्य---डेयरी उद्योग -मांस उद्योग है! यंहा बछड़ो और बैलों को, कमजोर और बीमार गायों को, और दूध देना बंद करने पर स्वस्थ गायों को कत्लखानों में भेज दिया जाता है! दूध डेयरी का गौण उत्पाद है । ✅

अर्धसत्य---आयोडाईज नमक से
                आयोडीन की कमी पूरी
                होती है !

पूर्णसत्य---आयोडाईज नमक का
               कोई इतिहास नहीं है, ये
               पश्चिम का कंपनी षड्यंत्र
               है आयोडाईज नमक में
             आयोडीन नहीं पोटेशियम
           आयोडेट होता है जो भोजन
             पकाने पर गर्म करते समय
          उड़ जाता है स्वदेशी जागरण
         मंच के विरोध के फलस्वरूप 
         सन्2000 में  सरकार
         ने ये प्रतिबन्ध हटा लिया था,
         लेकिन दुसरी सरकार सत्ता में आते
      ही इसे फिर से लगा दिया ताकि
       लूट तंत्र चलता रहे और विदेशी
       कम्पनियाँ पनपती रहे । ✅

अर्धसत्य--- शक्कर (चीनी ) का
                 कारखाना !

पूर्णसत्य--- शक्कर (चीनी ) का
         कारखाना इस नाम की आड़
         में चलने वाला शराब का
         कारखाना शक्कर इसका
         गौण उत्पाद है । ✅

अर्धसत्य---शक्कर (चीनी ) सफ़ेद
                जहर है !

पूर्णसत्य--- रासायनिक प्रक्रिया  के
              कारण कारखानों में बनी
             सफ़ेद शक्कर(चीनी) जहर
              है ! पम्परागत शक्कर
              एकदम सफ़ेद नहीं होती !
             थोडा हल्का भूरा रंग लिए
             होती है ! ✅

अर्धसत्य--- फ्रिज में आहार ताज़ा
                होता है !

पूर्णसत्य--- फ्रिज में आहार ताज़ा
              दिखता है पर होता नहीं है
              जब फ्रिज का अविष्कार
              नहीं हुआ था तो इतनी
              देर रखे हुए खाने को  
              बासा / सडा हुआ खाना
              कहते थे । ✅

अर्धसत्य--- चाय से ताजगी आती है!

पूर्णसत्य--- ताजगी गरम पानी से
               आती है! चाय तो केवल
               नशा(निकोटिन) है । ✅

अर्धसत्य---एलोपैथी स्वास्थ्य
               विज्ञान है !

पूर्णसत्य---एलोपैथी स्वास्थ्य विज्ञानं
         ✅ नहीं चिकित्सा विज्ञान है!

अर्धसत्य---एलोपैथी विज्ञानं ने बहुत
               तरक्की की है !

पूर्णसत्य--- दवाई कंपनियों ने बहुत
             तरक्की की है! एलोपैथी में
            मूल दवाइयां 480-520 है
             जबकि बाज़ार में 1 लाख 
             से अधिक दवाइयां बिक
             रही है ।✅

अर्धसत्य--- बैक्टीरिया वायरस के
                कारण रोग होते हैं !

पूर्णसत्य--- शरीर में बैक्टीरिया
               वायरस के लायक
               वातावरण तैयार होने पर
               रोग होते हैं ! ✅

अर्धसत्य--- भारत में लोकतंत्र है !
              जनता के हितों का ध्यान
               रखने वाली जनता द्वारा
               चुनी हुई सरकार है !

पूर्णसत्य--- भारत में लोकतंत्र नहीं
               कंपनी तन्त्र है बहुत से
               सांसद, मंत्री, प्रशासनिक
               अधिकारी कंपनियों के
               दलाल हैं उनकी भी
               नौकरियां करते हैं उनके
               अनुसार नीतियाँ बनाते
               हैं, वे जनहित में नहीं
               कंपनी हित में निर्णय लेते
               हैं ! भोपाल गैस कांड से
               बड़ा उदहारण क्या हो
               सकता है !जंहा एक
               अपराधी मुख्यमंत्री और
            प्रधानमंत्री के आदेशानुसार
            फरार हो सका ! लोकतंत्र
            होता तो उसे पकड के
            वापस लोटाते । ✅

अर्धसत्य--- आज के युग में
                मार्केटिंग का बहुत
                विकास हो गया है !

पूर्णसत्य--- मार्केटिंग का नहीं ठगी
               का विकास हो गया है !
               माल गुणवत्ता के आधार
             पर नहीं विभिन्न प्रलोभनों
             व जुए के द्वारा बेचा जाता
             है ! जैसे क्रीम गोरा बनाती
             है!भाई कोई भैंस को गोरा
             बना के दिखाओ ! ✅

अर्धसत्य--- टीवी मनोरंजन के लिए
                घर घर तक पहुँचाया
                गया है !

पूर्णसत्य--- जब टी वी नहीं था तब
            लोगों का जीवन देखो और
        आज देखो जो आज इन्टरनेट
         पर बैठे सुलभता से जीवन जी
        रहे हैं !उन्हें अहसास नहीं होगा
        कंपनियों का माल बिकवाने
        और परिवार व्यवस्था को
        तोड़ने
          े के लिए टी वी घर घर
        तक पहुँचाया जाता है ! ✅

अर्धसत्य--- टूथपेस्ट से दांत साफ
                होते हैं !

पूर्णसत्य--- टूथपेस्ट करने वाले   
           यूरोप में हर तीन में से एक
           के दांत ख़राब हैं दंतमंजन
           करने से दांत साफ होते हैं
           मंजन -मांजना, क्या बर्तन
           ब्रश से साफ होते हैं ?
           मसूड़ों की मालिश करने से
           दांतों की जड़ें मजबूत भी
           होती हैं ! ✅

अर्धसत्य--- साबुन मैल साफ कर
          त्वचा की रक्षा करता है !

पूर्णसत्य--- साबुन में स्थित केमिकल
           (कास्टिक सोडा, एस. एल.
            एस.) और चर्बी त्वचा को
            नुकसान पहुंचाते हैं, और
            डाक्टर इसीलिए चर्म रोग
            होने पर साबुन लगाने से
            मना करते हैं ! साबुन में गौ
            की चर्बी पाए जाने पर
            विरोध होने से पहले
            हिंदुस्तान लीवर हर साबुन
            में गाय की चर्बी का
            उपयोग करती थी। ✅

किडनी को साफ़ करें वह भी सिर्फ 5 रुपये में।

✅o हमारी किडनी एक बेहतरीन फिल्टर हैं जो सालों से हमारे खून की गंदगी को साफ़ करने का काम करती हैं मगर हर फिल्टर  की तरह इसको भी साफ़ करने की जरूरत हैं ताकि ये और भी अच्छा काम करें।
आज हम आपको बता रहे हैं इसकी सफाई के बारे में और वह भी सिर्फ 5 रुपये में।

  O✅ एक मुट्ठी भर धनिया लीजिए इसको छोटे छोटे टुकड़ों में काट लें और अच्छी तरह धुलाई कर ले। फिर एक बर्तन में १ लीटर पानी डाल कर इन टुकड़ों को डाल दे, 10 मिनट तक धीमी आँच पर पकने दे, बस अब इसको छान लें और ठंडा होने दो अब इस ड्रिंक को हर रोज़ एक गिलास खाली पेट पिएँ। आप देखेंगे के आपके पेशाब के साथ सारी गंदगी बाहर आ रही हैं। ✅
NOTE : - इसके साथ थोड़ी से अजवायन डाल लें तो सोने पे सुहागा हो जाए।

अब समझ आया कि हमारी माँ अक्सर धनिये की चटनी क्यों बनाती थी और हम आज उनको old fashion कहते हैं।

वैदिक ज्ञान
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Thursday, May 26, 2016

सफल जीवन के सुत्र

*सफल जीवन* *के* *सूत्र*

✍1. *जीवन*

जब तुम पैदा हुए थे तो तुम रोए थे जबकि पूरी दुनिया ने जश्न मनाया था। अपना जीवन ऐसे जियो कि तुम्हारी मौत पर पूरी दुनिया रोए और तुम जश्न मनाओ।

✍2. *कठिनाइयों*

जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते|

✍3. *असंभव*

इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं| हम वो सब कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, जो आज तक हमने नहीं सोचा|

✍4. *हार ना मानना*

बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है|

✍5. *हार जीत*

सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है|

✍6. *आत्मविश्वास*

अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है

✍7. *महानता*

महानता कभी न गिरने में नहीं बल्कि हर बार गिरकर उठ जाने में है|

✍8. *गलतियां*

अगर आप समय पर अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते है तो आप एक और गलती कर बैठते है| आप अपनी गलतियों से तभी सीख सकते है जब आप अपनी गलतियों को स्वीकार करते है|

✍9. *चिन्ता*

अगर आप उन बातों एंव परिस्थितियों की वजह से चिंतित हो जाते है, जो आपके नियंत्रण में नहीं तो इसका परिणाम समय की बर्बादी एवं भविष्य पछतावा है|

✍10. *शक्ति*

ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं| वो हम हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है|

✍11. *मेहनत*

हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां हमारा भाग्य लिख देंगी|

✍12. *सपने*

सपने वो नहीं है जो हम नींद में देखते है, सपने वो है जो हमको नींद नहीं आने देते।

✍13. *समय*

आप यह नहीं कह सकते कि आपके पास समय नहीं है क्योंकि आपको भी दिन में उतना ही समय (24 घंटे) मिलता है जितना समय महान एंव सफल लोगों को मिलता है|

✍14. *विश्वास*

विश्वास में वो शक्ति है जिससे उजड़ी हुई दुनिया में प्रकाश लाया जा सकता है| विश्वास पत्थर को भगवान बना सकता है और अविश्वास भगवान के बनाए इंसान को भी पत्थर दिल बना सकता है|

✍16. *सफलता*

दूर से हमें आगे के सभी रास्ते बंद नजर आते हैं क्योंकि सफलता के रास्ते हमारे लिए तभी खुलते जब हम उसके बिल्कुल करीब पहुँच जाते है|

✍17. *सोच*

बारिश की दौरान सारे पक्षी आश्रय की तलाश करते है लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही avoid कर देते है। समस्याए common है, लेकिन आपका नजरिया इनमे difference पैदा करता है।

✍18.  *प्रसन्नता*

यह पहले से निर्मित कोई चीज नहीं है..ये आप ही के कर्मों से आती है
💥🙏🏻😊😊🙏🏻💥

- गायत्री संकलन
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Tuesday, May 17, 2016

माऊली चा शोध

विज्ञान युगाचा अभिमान धरणार्‍या मंडळींना ज्ञानेश्‍वरीने विज्ञानावर कशी मात केली आहे हे त्यातील काही ओव्यांवरून लक्षात येईल. अलीकडच्या काही शतकांमध्ये जे क्रांतीकारक शोध लागले आहेत, त्यांचे मूळ ज्ञानेश्‍वरीत सापडते.

सूर्य स्थिर आहे आणि पृथ्वी सूर्याभोवती फिरते हा शोध कोपर्निकसने  लावला. त्याचा हा सिद्धांत बायबलविरोधी असल्याने धर्ममार्तंडांनी त्याचा छळ केला. कारण बायबलमध्ये पृथ्वी स्थिर असून सूर्य फिरतो असा उल्लेख आहे (आणि यांना आपण विज्ञाननिष्ठ समजतो). ज्ञानेश्‍वरीने 725 वर्षापूर्वीच सूर्याचे भ्रमण हा भास आहे, हे वैज्ञानिक सत्य मांडले होते.
"उदय-अस्ताचे प्रमाणे, जैसे न चालता सूर्याचे चालणे, तैसे नैष्कर्म्यत्व जाणे, कर्मींचि असता".

सूर्य चालत नसून चालल्यासारखा दिसतो. सूर्याचे न चालता चालणे हा ज्ञानेश्‍वरीतील क्रांतीकारक शोध ठरत नाही काय?

मानवी जन्माची प्रक्रिया कसल्याही उपकरणाची मदत न घेता  ज्ञानेश्‍वर महाराज जेव्हा सांगतात तेव्हा नामांकित डॉक्टरांनाही आश्‍चर्य वाटल्याशिवाय राहात नाही. माऊली लिहितात,

"शुक्र-शोणिताचा सांधा, मिळता पाचांचा बांधा, वायुतत्व दशधा, एकचि झाले".

शुक्र जंतू पुरुषाच्या वीर्यामध्ये असतात व शोणित पेशी स्त्रियांच्या बिजांड कोषात असतात. या शोणित पेशी अतिसूक्ष्मदर्शक यंत्राशिवाय दिसत नाहीत. सूक्ष्मदर्शक यंत्राचा शोध चारशे वर्षांतील आहे. परंतु माऊलींनी कसल्याही सूक्ष्मदर्शकाच्या मदती-शिवाय शोणित पेशींचा उल्लेख केला आहे. माऊली कुठल्या मेडिकल कॉलेजात गेले होते? इथे त्यांच्यातील सर्वज्ञता दिसते.

पृथ्वी सपाट आहे की गोल या प्रश्‍नावर शास्त्रज्ञांत बराच काळ वाद चालला होता. पृथ्वी गोल आहे हा सिद्धांत आता जगन्मान्य झाला आहे. ज्ञानेश्‍वरीने 725 वर्षापूर्वीच पृथ्वी गोल असल्याचे सांगितले.

"पृथ्वीये परमाणूंचा उगाणा घ्यावा, तरी हा भूगोलचि काखे सुवावा, तैसा विस्तारू माझा पाहावा, तरी जाणावे माते"

भूगोल हा शब्दच ज्ञानेश्‍वरीने मराठीला दिला आहे. आणि पृथ्वी गोल असल्याचे निःसंदिग्ध सांगताना परमाणूचाही (Micro-Electron) स्पष्ट उल्लेख केलाय.

पाण्याच्या घर्षणातून जलविद्युत निर्माण होते. हा विजेचा शोधही शे दिडशे वर्षांपूर्वीचा आहे. परंतु माऊली 725 वर्षांपूर्वीच सांगतात की, पाण्याचे जोरात घर्षण झाले की वीज तयार होते.

"तया उदकाचेनि आवेशे, प्रगटले तेज लखलखीत दिसे, मग तया विजेमाजी असे, सलील कायी?".

सागराच्या पाण्याची वाफ होते, त्याचे ढग बनतात व त्याला थंड हवा लागली की पाऊस पडतो. ही पाऊस पडण्याची प्रक्रिया विज्ञानाने अलिकडे शोधून काढली आहे. परंतु माऊली ज्ञानेश्‍वरीत लिहितात की, सुर्याच्या प्रखर उष्णतेने मी परमात्माच पाणी शोषून घेतो व त्या वाफेचे ढगात रूपांतर करतो व इंद्रदेवतेच्या रूपाने पाऊस पाडतो. ती पावसाचे शास्त्रशुद्ध तंत्र सांगणारी ओवी अशी:

"मी सूर्याचेनि वेषे, तपे तै हे शोषे, पाठी इंद्र होवोनि वर्षे, मग पुढती भरे".

विज्ञानाला सूर्यमालेतील ग्रहांचा शोध लागला आहे. या विश्वाच्या पोकळीतील फक्त एकच सूर्यमाला मानवी बुद्धीला सापडली. अशा अनेक सूर्यमाला या पोकळीत अस्तित्वात आहेत. विश्वाला अनंत हे विशेषण लावले जाते. या विश्वात अनंत ब्रम्हांडे आहेत म्हणून भगवान अनंतकोटी ब्रहांडनायक ठरतात. परंतु माऊलींनी 725 वर्षापूर्वीच सूर्यमालेतील मंगळ या ग्रहाबद्दल लिहिले आहे. विज्ञानाने शोध लावण्यापूर्वीच माऊली मंगळाचे अस्तित्व सांगतात:

"ना तरी भौमा नाम मंगळ, रोहिणीते म्हणती जळ, तैसा सुखप्रवाद बरळ, विषयांचा"

किंवा
"जिये मंगळाचिये अंकुरी, सवेचि अमंगळाची पडे पारी"

किंवा "ग्रहांमध्ये इंगळ, तयाते म्हणति मंगळ".

इतकेच नव्हे, तर नक्षत्रांचेही उल्लेख आहेत. रोहिणीचा वरच्या ओवीत आलाय, तसेच मूळ नक्षत्र:

"परी जळो ते मूळ-नक्षत्री जैसे"

किंवा स्वाती नक्षत्र:

"स्वातीचेनि पाणिये, होती जरी मोतिये, तरी अंगी सुंदराचिये, का शोभति तिये".

कॅमेरा आणि पडद्यावर दिसणारा चित्रपट यांचे मूळही ज्ञानेश्‍वरीत सापडते:

"जेथ हे संसारचित्र उमटे, तो मनरूप पटु फाटे, जैसे सरोवर आटे, मग प्रतिमा नाही".

अर्थात संकल्प-विकल्पांमुळे मनाचे चित्र उमटवणारा पडदा फाटून जातो. चित्रपटासाठी पडदा आवश्यक आहेच किंवा सरोवरात पाणी असेल तरच आपली प्रतिमा त्यामध्ये उमटते. ते आटून गेले तर उमटत नाही.

या सर्व ओव्यांचा आशय लक्षात घेतला तर ज्ञानेश्‍वरीची वैज्ञानिकता ध्यानात येईल. विज्ञानयुगात दिशाभुल झालेल्या युवक-युवतींनी ज्ञानेश्‍वरीची ही शास्त्रीयता लक्षात घेऊन मानवी जीवनाचे यथार्थ दर्शन घडविण्यार्‍या संत वाड़मयाच्या सहवासात यावे. ज्ञानेश्‍वरी, एकनाथी भागवत, तुकारामगाथा व दासबोधाचा मनःपूर्वक ध्यास घ्यावा म्हणजे प्रत्येकाला जीवनाचे अनंतरूप समजेल. मात्र यासाठी विज्ञानाचा वृथा अहंकार टाकून संतांना सर्वभावे शरण जाऊन त्यांचाच सत्संग करावा लागेल.ओम शिव
[18/05 7:26 am] Bala: संत ज्ञानेश्वरांनी वयाच्या १४ व्या वर्षी ज्ञानेश्वरी लिहीली.
तुकोबारायांनी देखील वय वर्ष १४-१५ च्या आसपास किंवा त्याही आधी पहिला अभंग रचला असावा.
समर्थ रामदासांचे मनाचे श्लोक जेव्हा त्या काळातील समाजाच्या कानांवर पडायला सुरवात झाली तेव्हा त्यांचे वय १० पेक्षाही कमी होते.
जिजाऊंनी श्री राम, कृष्णाच्या कथा सांगत घडवलेले शिवप्रभु शिवराय यांचे वय होते अवघे १४ जेव्हा त्यांनी शिवपिंडीवर स्वता:च्या रक्ताचा अभिषेक करून स्वराज्याची शपथ घेतली.
तर.. शंभु बाळांनी शास्त्र आणि क्षस्राच्या संस्कारात भिजत "बुधभुषण" नामक ग्रंथ लिहीला तो देखील वयाच्या १६ व्या वर्षीच.
अशी कैक उदाहरणं आहेत आपल्याकडे. अगदी विष्णुगूप्त चाणक्य पासुन ते स्वामी विवेकानंद, बाळगंगाधर टिळक, सावरकरां पर्यन्त.
ह्या सगळ्यां संत पुरूषांमध्ये समान धागा हाच कि हे सगळे, धर्म आणि मातृभुमी वरील अफाट प्रेमाने झपाटलेले होते. ह्या सगळ्यांमधे प्रचंड उर्जा होती ती समाजाच्या कल्याणाची, प्रगतीची,  स्वता:च्या अध्यात्मिक उन्नतीची.
आम्हाला आता ज्या वयात "होशील का माझ्या पोराची आई" सुचतय ना, त्याच वयात ती पिढी लिहित होती..
इस कदर वाकिफ है,
मेरी कलम मेरे जज्बातोसे ।
मै इश्क लिखना भी चाहू,
तो भी इन्कलाब लिखा जाता है ।।
एकीकडे एैन तारूण्यात असं लिहिणारे भगतसिंग तर दुसरीकडे "तुझ्याशिवाय करमेना" अशा वयात १८ वर्षाची सुंदर पत्नी, ६ महिन्याचं गोंडस बाळ ह्यांना सोडून देश धर्मासाठी घराबाहेर पडणारे २१ वर्षीय सावरकर. आख्खी पिढीच अजब.
ह्या सगळ्यांचीच वयं जरी १५, १६ , २० असली तरी त्याची प्रोसेस काही वर्ष आधीच सुरू झाली असणार हे वेगळे सांगायलाच नको.
अशा कोणत्या मातीत ह्या व्यक्ती घडल्या असतील? नेमके कोणते संस्कार ह्यांच्या मनावर बिंबवले गेले असतील की अशा तेजस्वी विचारांची ही माणसं निर्माण होत होती?
आज अनेक शतकं उलटल्यानंतरही अशा महापुरूषांची आठवण झाली तरी शरीरावर रोमांच आल्याशिवाय राहत नाही, मान आदराने खाली झुकते, हात आपोआप जोडले जातात. मनातले भाव जागे होतात, डोळे पाणवतात,  एका वेगळ्याच आनंदाने मन अगदी भरून पावतं.
हे अशा प्रकारचे अनुभव आपल्यापैकी ब-याच जणांना कधीना कधीतरी आलेले असतात.
पण आता...
गेल्या काही दशकात ही परिस्थिती अगदीच बंद झाल्याचं जाणवतय. चांगली पीढी जन्माला येण्याचं संपलंय की काय अशी भीती निर्माण झाली आहे.  शाळकरी मुलं फक्त व्यसन आणि अश्लीलते कडे झुकलेली दिसते आहे.
ज्या वयात पुर्वी प्रतिभावान संत जन्माला येत होती त्या वयात आता वर्तमान काळात गावगुंड निर्माण होत आहेत. वय वर्ष १६ व्या मधील मुलं व्यभिचार आणि बलात्कारा सारख्या हिडीस प्रकारात पडलेले आढळतायत. दिल्लीतील चालत्या बस मधे घडलेला बलात्कार काय किंवा मुंबईच्या मिल परिसरातला बलात्कार काय! ही सगळी त्याचीच साक्ष. किशोरवयीन मुलं.. खुन, लफडी, मारामारीत आघाडीवर आहेत.  शाळेत शिकणा-या  विद्यार्थ्यांना हातात सिगारेट असणं अन् तोंडात शिव्या असणं आता अभिमानाचं झालंय
ही अशी पीढी उद्या प्रौढ होऊन कशी मुलं जन्माला घालतील आणि काय संस्कार करतील ह्याचा विचार न केलेलाच बरा.
आपले वैदिक ग्रंथ सांगतात की जर एक पिढी बरबाद झाली की पुढच्या पाच पिढ्या बरबाद होतात.
मग चांगला समाज निर्माण होणारच कसा?
इंग्रजांनी आमची गुरूकूल शिक्षण पध्दती बंद केली. आणि तिथूनच आपल्या राष्ट्रीची अधोगती सुरू झाली.
सर्वात आधी आम्ही आमची भाषा विसरलो. मातृभाषेची जागा कमकुवत इंग्रजी ने घेतली. मग हळुच सुरवात झाली ती आमचा जाज्वल्य इतिहास पुसण्याची.  जे जे वाईट ते ह्या मातीतलं आणि जे जे चांगलं ते फक्त परकीयांचं हे आमच्या मनावर बिंबवायला लागले. विमानाचा शोध आमचा नाही. आयुर्वेद आमचं नाही, अणुरेणु आम्हाला माहीत नाही, विज्ञान आम्हाला माहीत नाही, गुरूत्वाकर्षण, खगोलशास्त्र, भुशास्त्र, सर्जरी सगळं सगळं ह्यांच.
जर आमच्याकडे काहीच नव्हतं तर मग आमच्यावर गेली अनेक शतके इतकी आक्रमणं का?
आधी आमच्या भाषेवर, मग इतिहासावर, मग सणांवर,  त्यानंतर देवदिकांवर आता देशावर. आमचा प्रत्येक सण, प्रत्येक दैवत ह्यांचं टार्गेट. ह्यातूनच जन्माला यायला लागली fxxk yaar, टच वुड बोलणारी आणि ईशवराला नाकारणारी असुरी पिढी. पाश्चात्य शिक्षण देणा-या विद्यापीठातून (?) तयार झाले कन्हैय्या सारखे अक्कलशुन्य देशद्रोही राक्षस. आमचे संस्कार बदलले, आदर्श बदलले. जिजाऊ, राणी पद्मिनी आऊटडेटेड तर सनी लिओन, आलिया भट ह्या आत्ताच्या पिढीची आयडाॅल झाली. पाॅर्न पाहणारा सगळ्यात मोठा देश भारत झाला. कुंकू, टिकली, चुडा साडीतली आई माॅड मम्मा झाली. तीला जिन्स आणि लो बॅक टाॅप जास्त कनर्फटेबल वाटू लागला.
ह्या अधोगतीला सगळ्यात मोठा हातभार लावला तो ह्या सिनेसृष्टिने. हाताच्या बोटावर मोजणारे सिनेमे सोडले तर बाकी सगळेच "धन्यवाद" आहेत. पहिला आघात ह्या सिनेमांनी केला तो अभिजात संगीतावर, प्रत्येक गाणं खुदा, दुवा, मौला, इश्क, अल्ला, अशा परक्या उर्दु शिवाय पुरे होईनासे झाले. देवळं ही भ्रष्टाचारची केंद्र तर कबरी वरती चादर हे खुदा गाॅड कडे पोहचण्याचं माध्यम असं चित्र रंगवलं गेलं. आणि आता टार्गेट आहे नुकतीच वयात आलेली किशोरवयीन पिढी.
सध्याचे चित्रपट आम्हाला शिकवतात ब्ल्यु फिल्म पाहणं गैर नाही, प्रेमात पडणं म्हणजेच उदात्तीकरण, हातात सिगरेट आणि वाईनचा ग्लास असणं स्टेट्स सिंबाॅल आहे.  तुला बाॅयफ्रेंड  किंवा तुला गर्लफ्रेंड नसण हे अपमानास्पद आहे.
लहान वयातलं प्रेम दाखवले की मगच राष्ट्रपती पारितोषिक मिळवण्याचा मार्ग मोकळा होतो कि काय असा प्रश्न पडावा.
असे पारितोषिक जाहिर करून शासन नेमके कोणते संस्कार घडवतय समाजावर????
ह्या नॅशनल अॅवोर्ड चा नेमका हेतु काय? ह्यातून नेमके कोणते समाजकल्याण होणार आहे? किंवा आत्ताच्या पिढिचा कोणता उत्कर्ष, उन्नती होणार आहे. ह्या असल्या पारितोषिकांमुळे समाजात जाणारा संदेश हा योग्य आहे का?
की अशाच प्रकारचा समाज निर्माण होणं अपेक्षित आहे?
दोन पिठ्यांमधील फरक ठळकपणे जाणवतोय.
एक उत्कर्षाकडे जाणारी. आणि..
दुसरी अधोगतीकडे जाणारी.

संभ्रम...संभ्रम...आणि फक्त संभ्रम.

दोनच गोष्टि कळतायत
आपला देश विदेशी शिक्षणाचं इंधन भरून, टाॅप गिअर टाकून अधोगती कडे चाललाय...
आणि दुसरं समर्थ रामदासांचे शब्द २४ तास डोक्यात रेंगाळतायत, ते म्हणजे...
अखंड असावे सा..व..धा..न

भारतीय वैदिक ज्योतिष
डॉ. सुहास रोकडे
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