Friday, April 19, 2019

देवगुरु बृहस्पती अष्टोत्तर नामावली -डॉ.सुहास रोकडे

बृहस्पती अष्टोत्तर शतनामावली


जिन जातकों की जन्म कुंडली में राहु/गुरु का चांडाल योग बन रहा हो या गुरु किसी भी प्रकार से पीड़ित हो रहा हो तब उन्हें नित्य प्रति बृहस्पति जी के 108 नाम का जाप करना चाहिए. इससे गुरु चांडाल योग के अशुभ प्रभावों में कमी आती है.

विशेष (Important) – जिन लड़कों का यज्ञोपवीत अर्थात जनेऊ नहीं हुआ है उन्हें और महिलाओं को इस पाठ के आरंभ में “ऊँ” के स्थान पर “श्री” का प्रयोग करना चाहिए.   

ऊँ वृं गुरवे नम:
ऊँ वृं गुणवराय नम:
ऊँ वृं गोप्त्रे नम:
ऊँ वृं गोचराय नम:
ऊँ वृं गो-पतिप्रियाय नम:
ऊँ वृं गुणिने नम:
ऊँ वृं गुणवतां श्रेष्ठाय नम:
ऊँ वृं गुरुणां गुरवे नम:
ऊँ वृं अव्ययाय नम:
ऊँ वृं जेत्रे नम:
ऊँ वृं जयन्ताय नम:
ऊँ वृं जयदाय नम:
ऊँ वृं जीवाय नम:
ऊँ वृं अनन्ताय नम:
ऊँ वृं जयावहाय नम:
ऊँ वृं आंगीरसाय नम:
ऊँ वृं अध्वरासक्ताय नम:
ऊँ वृं विविक्ताय नम:
ऊँ वृं अध्वरकृत्पराय नम:
ऊँ वृं वाचस्पतये नम:
ऊँ वृं वशिने नम:
ऊँ वृं वश्याय नम:
ऊँ वृं वरिष्ठाय नम:
ऊँ वृं वाग् विचक्षणाय नम:
ऊँ वृं चित्तशुद्धिकराय नम:
ऊँ वृं श्रीमते नम:
ऊँ वृं चैत्राय नम:
ऊँ वृं चित्रशिखण्डिजाय नम:
ऊँ वृं बृहद्रथाय नम:
ऊँ वृं बृहद्भानवे नम:
ऊँ वृं वृहस्पतये नम:
ऊँ वृं अभीष्टदाय नम:
ऊँ वृं सुराचार्याय नम:
ऊँ वृं सुराध्यक्षाय नम:
ऊँ वृं सुरकार्यहितकराय नम:
ऊँ वृं गीर्वाणपोषकाय नम:
ऊँ वृं धन्याय नम:
ऊँ वृं गीष्पतये नम:
ऊँ वृं गिरीशाय नम:
ऊँ वृं अनघाय नम:
ऊँ वृं धीवराय नम:
ऊँ वृं दिव्यभूषणाय नम:
ऊँ वृं देवपूजिताय नम:
ऊँ वृं धनुर्धराय नम:
ऊँ वृं दैत्यहन्त्रे नम:
ऊँ वृं दयासाराय नम:
ऊँ वृं दयाकराय नम:
ऊँ वृं दारिद्र्यविनाशनाय नम:
ऊँ वृं धन्याय नम:
ऊँ वृं धिषणाय नम:
ऊँ वृं दक्षिणायनसम्भवाय नम:
ऊँ वृं धनुर्वीराधिपाय नम:
ऊँ वृं देवाय नम:
ऊँ वृं धनुर्बाणधराय नम:
ऊँ वृं हरये नम:
ऊँ वृं अंगीरसाब्दसंजाताय नम:
ऊँ वृं अंगिरसकुलोद्भवाय नम:
ऊँ वृं सिन्धुदेशाधिपाय नम:
ऊँ वृं धीमते नम:
ऊँ वृं स्वर्णकायाय नम:
ऊँ वृं चतुर्भुजाय नम:
ऊँ वृं हेमांगदाय नम:
ऊँ वृं हेमवपुषे नम:
ऊँ वृं हेमभूषणभूषिताय नम:
ऊँ वृं पुष्यनाथाय नम:
ऊँ वृं पुष्यरागमणि मण्डनमण्डिताय नम:
ऊँ वृं काशपुष्पसमानाभाय नम:
ऊँ वृं कलिदोषनिवारकाय नम:
ऊँ वृं इन्द्रादिदेवदेवेशाय नम:
ऊँ वृं देवताsभीष्टदायकाय नम:
ऊँ वृं असमानबलाय नम:
ऊँ वृं सत्त्वगुणसम्पद्विभावसवे नम:
ऊँ वृं भूसुराभीष्टफलदाय नम:
ऊँ वृं भूरियशसे नम:
ऊँ वृं पुण्यविवर्धनाय नम:
ऊँ वृं धर्मरूपाय नम:
ऊँ वृं धनाध्यक्षाय नम:
ऊँ वृं धनदाय नम:
ऊँ वृं धर्मपालनाय नम:
ऊँ वृं सर्वदेवतार्थतत्त्वज्ञाय नम:
ऊँ वृं सर्वापद्विनिवारकाय नम:
ऊँ वृं सर्वपापप्रशमनाय नम:
ऊँ वृं स्वमतानुगतामराय नम:
ऊँ वृं ऋग्वेदपारगाय नम:
ऊँ वृं सदानन्दाय नम:
ऊँ वृं सत्यसन्धाय नम:
ऊँ वृं सत्यसंकल्पमानसाय नम:
ऊँ वृं सर्वागमज्ञाय नम:
ऊँ वृं सर्वज्ञाय नम:
ऊँ वृं सर्ववेदान्तविदुषे नम:
ऊँ वृं ब्रह्मपुत्राय नम:
ऊँ वृं ब्राह्मणेशाय नम:
ऊँ वृं ब्रह्मविद्याविशारदाय नम:
ऊँ वृं समानाधिकनिर्मुक्ताय नम:
ऊँ वृं सर्वलोक वंशकराय नम:
ऊँ वृं सुरासुरगन्धर्ववन्दिताय नम:
ऊँ वृं सत्यभाषणाय नम:
ऊँ वृं सुराचार्याय नम:
ऊँ वृं दयावते नम:
ऊँ वृं शुभलक्षणाय नम:
ऊँ वृं लोकत्रयगुरवे नम:
ऊँ वृं श्रीमते नम:
ऊँ वृं सर्वगाय नम:
ऊँ वृं सर्वतोविभवे नम:
ऊँ वृं सर्वेशाय नम:
ऊँ वृं सर्वदा तुष्टाय नम:
ऊँ वृं सर्वपूजिताय नम:
ऊँ वृं सर्वदेवेभ्यो नम:

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Thursday, November 22, 2018

गुरुनानकजी के नव मंत्र रहस्यार्थ

क्या आप जानते हैं गुरु नानक देव जी के ये 9 मूल मंत्र


सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव का जन्म लाहौर के पास तलवंडी नामक गांव में कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ। गुरुनानक का जहां जन्म हुआ था वह स्थान आज उन्हीं के नाम पर अब ननकाना के नाम से जाना जाता है। ननकाना अब पाकिस्तान में है।

उनका परिवार कृषि करके आमदनी करते थे। उनके चेहरे पर बाल्यकाल से ही अद्भुत तेज दिखाई देता था। गुरु नानक जी के दिए गए मूल मंत्र आज भी प्रासंगिक हैं। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं गुरु नानक देव जी के नौ मूल मंत्र जो जनमानस के लिए बहुत ही उपयोगी है। 

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बाणी का आरंभ मूल मंत्र से होता है। ये मूल मंत्र हमें उस परमात्मा की परिभाषा बताता है जिसकी सब अलग-अलग रूप में पूजा करते हैं।

1 एक ओंकार : अकाल पुरख (परमात्मा) एक है। उसके जैसा कोई और नहीं है। वो सब में रस व्यापक है। हर जगह मौजूद है। 

2 सतनाम : अकाल पुरख का नाम सबसे सच्चा है। ये नाम सदा अटल है, हमेशा रहने वाला है। 

3 करता पुरख : वो सब कुछ बनाने वाला है और वो ही सब कुछ करता है। वो सब कुछ बनाके उसमें रस-बस गया है। 

4 निरभऊ : अकाल पुरख को किससे कोई डर नहीं है। 

5 निरवैर : अकाल पुरख का किसी से कोई बैर (दुश्मनी) नहीं है।

6 अकाल मूरत : प्रभु की शक्ल काल रहित है। उन पर समय का प्रभाव नहीं पड़ता। बचपन, जवानी, बुढ़ापा मौत उसको नहीं आती। उसका कोई आकार कोई मूरत नहीं है। 

7 अजूनी : वो जूनी (योनियों) में नहीं पड़ता। वो ना तो पैदा होता है ना मरता है। 

8 स्वैभं : (स्वयंभू) उसको किसी ने न तो जनम दिया है, न बनाया है वो खुद प्रकाश हुआ है। 

9 गुरप्रसाद : गुरु की कृपा से परमात्मा हृदय में बसता है। गुरु की कृपा से अकाल पुरख की समझ इनसान को होती है।

इन्हीं सभी मंत्रों को उन्होंने अपने जीवन में अमल किया और चारों ओर धर्म का प्रचार कर स्वयं एक आदर्श बने।

संकलन
ज्योतिष्याचार्य डॉ.सुहास रोकडे
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Tuesday, October 23, 2018

कोजागीरी पौर्णिमा के अमृतमय दुध का रहस्य जानिये

कोजागिरी पौर्णिमा के अमृतमय दुध का रहस्य

शरद पूर्णिमा / चंद्रमा से कैसे मिलता है अमृत जानिए इसका वैज्ञानिक कारण


शरद पूर्णिमाा इसे कोजगीरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इसे जागृति पूर्णिमा या कुमार पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार कुछ रातों का बहुत महत्व है जैसे नवरात्रि, शिवरात्रि और इनके अलावा शरद पूर्णिमा भी शामिल है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार चन्द्रमा को औषधि का देवता माना जाता है। इस दिन चांद अपनी 16 कलाओं से पूरा होकर अमृत की वर्षा करता है। मान्यताओं से अलग वैज्ञानिकों ने भी इस पूर्णिमा को खास बताया है, जिसके पीछे कई सैद्धांतिक और वैज्ञानिक तथ्य छिपे हुए हैं। इस पूर्णिमा पर चावल और दूध से बनी खीर को चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। इससे रोग खत्म हो जाते हैं और रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

औषधियों की स्पंदन क्षमता होती है अधिक
एक अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा पर औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक होती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी। चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है।  सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।

क्यों बनाई जाती है खीर ?
वैज्ञानिकों के अनुसार दूध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और भी आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है और इस खीर का सेवन सेहत के लिए महत्वपूर्ण बताया है। इससे पुनर्योवन शक्ति और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।

चांदी का विशेष महत्व
एक अन्य वैज्ञानिक शोध के अनुसार इस दिन दूध से बने उत्पाद का चांदी के पात्र में सेवन करना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। इस दिन बनने वाला वातावरण दमा के रोगियों के लिए विशेषकर लाभकारी माना गया है।

-डॉ.सुहास रोकडे
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Sunday, September 2, 2018

ज्ञान और विज्ञान का अंतर - डॉ.सुहास रोकडे

संपूर्ण वैज्ञानिक सत्य


आपले वेद आणि प्राचीन ज्ञान संपूर्ण थोतांड आहे कां ??? आणि आधुनिक विज्ञान परिपूर्ण आहे कां ???( एक अभ्यासपूर्ण विवेचन )
सदरील लेखात आपण विज्ञान आणि वैज्ञानिक आणि त्यांचे शास्त्रीय दृष्टीकोन याचा उहापोह केला आहे. ठीक आहे. विज्ञानात वैज्ञानिक निसर्ग नियमाना जाणून घेण्यासाठी प्रश्न विचारतो, उत्तरे शोधतो. तर्कावर आधारित सिद्धांत मांडतो. ते गणितीय पद्धत वापरून सिद्ध करतो हि सगळी तार्किक दृष्टी आहे. आपला हा सुद्धा दावा आहे कि मानवाने ३०० वर्षात अफाट प्रगती केलेली आहे.
सूर्य-चंद्र ग्रहणे, कोणत्या दिवशी, नेमक्या कोणत्या वेळी, जगात कुठे, कशी दिसतील याची अचूक गणिते या सिद्धांताच्या आधारे आपण गेली तीनशे वर्षे करीत आहोत. असा आपला दावा आहे.
ज्या माणसाला वेद म्हणजे काय आहे हे माहित नाही. ज्या माणसाला उपनिषदे म्हणजे काय हे माहित नाही. ज्या माणसाला प्राचीन भारतीय गणिती पद्धत म्हणजे काय हे माहित नाही. ज्या माणसाला प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र, अंतराळशास्त्र काय हे माहित नाही त्या माणसाला हा लेख वाचून विज्ञानाबद्दल प्रेमाचे भरते येणे स्वाभाविक आहे. परंतु हे सगळे अर्ध सत्य आहे. मध्यंतरी एका विद्वानाने अशीच टिप्पणी केली होती सगळे काही वेदात असेल तर तुम्ही पुढचे १० -१५ शोध आजच लावा कि, विज्ञान हे शोध लावण्याची वाट का पहात बसला आहात.
तर विज्ञान विरुद्ध प्राचीन भारतीय ज्ञान / अध्यात्म या विषयावर आपण मुद्देसूद, पुराव्यांच्या सह चर्चा करूया. विज्ञानाचे जे प्रेमी असतील त्यांनी आवर्जून हा लेख वाचावा माझ्या मुद्द्यांच्या बद्दल काही आक्षेप असतील ते नोंदवावे. आणि जर माझे मुद्दे योग्य असतील तर मान्य करण्याचा मोठेपणा सुद्धा दाखवावा.
१) कुतुब मिनार च्या समोर एक लोहस्तंभ आहे. २२ फुट उंच सुमारे ६.५ टन वजन असणारा wrought iron अर्थात ओतीव लोखंडाचा बनलेला स्तंभ. ज्याचे वय कमीत कमी १६०० वर्षे आहे. ज्याच्यावर एक अत्यंत पातळ असे आवरण चढवले आहे ज्यामुळे गेली १६०० वर्षे या खांबाला गंज लागलेला नाही. आय आय टी कानपूर च्या धातू तज्ञांनी अभ्यास करून एका विशिष्ट रासायनिक प्रक्रियेचा उल्लेख केला आहे ज्याचे आवरण फक्त १० micron आहे त्यामुळे हा स्तंभ अजूनही गंज पकडत नाही.
आपल्या महान वैज्ञानिक प्रगती चे मापदंड असणाऱ्या कोट्यावधी रुपयांच्या कारला सुद्धा मुंबईच्या खाऱ्या वातावरणात ३ ते ५ वर्षात बुडाला भरपूर गंज लागतो आणि मुंबईतील जुनी कार नेहमीच निम्म्या किमतीला विकली जाते. १६०० वर्षांच्या पूर्वी जिवंत असणारी अंधश्रद्धाळू विज्ञान परान्मुख माणसे जे करून गेली आहेत त्याची नक्कल तरी करण्याची आजच्या वैज्ञानिकाची आणि त्यांच्या समर्थकांची तयारी आहे कां ???
२)लेपाक्षी मंदिर आंध्र प्रदेश. या मंदिरात एक दगडाचा स्तंभ ( column ) आहे तो अधांतरी आहे. त्या खांबाच्या खालून आपण एक इंच जाडीची कोणतीही वस्तू फिरवून त्याची खात्री करून घेऊ शकतो. याच पद्धतीचा दीपस्तंभ मी विजयनगर साम्राज्यात सुद्धा पहिला होता. एक मेकानिकल इंजिनियर म्हणून मी तो कसा बनवला असेल हे नक्की सांगू शकतो. सुमारे १० टन वजन असणारा एक २ फुट व्यास असणारा दगड घ्या. त्याच्यावर तुम्हाला हवे तसे नक्षीकाम करा ( सुमारे ५ ते १० वर्षे लागणार हे करायला पारंपारिक हत्यारे वापरून. ) नंतर त्या खांबाच्या एका बाजूला एक मोठे गोल भोक करा त्यात लोहकांत दगड ( चुंबकीय गुणधर्म असणारा दगड ) घट्ट ठोकून बसवा. नंतर जिथे हा स्तंभ उभा करायचा असेल तिथे जमिनीत या दगडाचे वारा, पाउस, उन, वादळ या सगळ्या प्रकारात सुद्धा रक्षण करू शकेल इतका मजबूत पायाचा दगड बसवा त्यात तितकाच मजबूत पायाचा लोहकांत दगड ठोकून बसवा. आता या दोन्ही लोह्कांत दगडांचा असा संयोग हवा कि त्यांनी परस्परांना दूर तर लोटले पाहिजे पण ते स्थिर सुद्धा राहिले पाहिजेत ( १० टन वजनाचा दगड घेऊन आजच्या कोणत्याही वैज्ञानिकाने हे करून दाखवावे ) मग खालील दगडावर हा वरील दगड ढकलत ढकलत आणा दोन्ही दगड एकमेकांच्या चुंबकीय क्षेत्रात आले कि ते स्थिर होतील. आणि नंतर १००० वर्ष तसेच राहतील.. ( अजून किती काळ राहतील ते माहित नाही ) असा अफलातून तंत्रज्ञानाचा वापर करणारी मंडळी निर्बुद्ध होती ? त्यांना विज्ञान तुमच्या न्यूटन पेक्षा कमी समजत होते असे तुमचे मत आहे का ? बर हे करणारी मंडळी कलाकार होती, शिल्पी होती, तुमच्या पुरोगामी भाषेत बहुजन.. ब्राह्मण सुद्धा नव्हती तरी त्यांचे गणित, विज्ञान आणि निसर्गाचा अभ्यास इतका पक्का होता कि ती मंडळी या गोष्टी लीलया करत होती.
३) महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापूर किरणोत्सव : आदिमाया महालक्ष्मीचे हे मंदिर कमीत कमी १००० वर्ष जुने आहे. या मंदिरात भूगोलाचा अभ्यास करून मुख्य द्वार असे बनवले आहे कि दर वर्षी विशिष्ट नक्षत्र असताना सूर्याचे पहिले किरण हे देवीच्या पायावर पडते आणि जसा सूर्य वर वर जातो ती किरणे तिच्या मुखापर्यंत पोचतात. हा सोहळा किरणोत्सव म्हणून ओळखला जातो. ज्या लोकांनी हे मंदिर बांधले त्यांचा भूगोल अत्यंत पक्का असल्या शिवाय आणि त्यांचे गणितीय ज्ञान अत्यंत चपखल असल्याशिवाय हे शक्य होऊ शकेल ? आज असेच एक मंदिर उभे करायचे ठरले तुमचे शास्त्रज्ञ सध्या ज्ञात असणारी साधने आणि तंत्रज्ञान घेऊन सुद्धा १००० वर्ष टिकेल अशी वस्तू निर्माण करू शकतील ? आणि याच पद्धतीचा किरणोत्सव तुमच्या न्यूटन च्या मूर्तीवर पाडून दाखवू शकतील ???
४) कैलाश मंदिर वेरूळ : वेरूळ येथील लेणीनच्या मध्ये असणारे कैलास मंदिर हे जगातील पहिले आधी कळस मग पाया या पद्धतीने बांधलेले मंदिर आहे. ७व्या शतकात बांधलेले हे मंदिर एकाच शीलाखंडाला पूर्णपणे कोरून बनवले आहे. कमीत कमी तीन पिढ्या या मंदिराच्या निर्मितीसाठी राबल्या आहेत. त्या काळातील लोकांना एकच इतका मोठा दगड कसा ओळखू आला असेल. त्याचे माप कसे कळले असेल कि त्यांनी बरोबर तीन मजली मंदिर उभे केले. आधी कळस मग पाया पद्धती वापरून बनवलेले हे एकमेव मंदिर म्हणजे शिल्पकलेचा आणि तत्कालीन लोकांच्या भूमीच्या गर्भाच्या अभ्यासाचा एक जिवंत नमुना आहे.
५) बाण स्तंभ. सोरटी सोमनाथाचे सुप्रसिद्ध मंदिर आपल्या सगळ्यांनाच माहित आहे. बारा ज्योतिर्लिंगापैकी एक असणारे हे मंदिर गझनीच्या मोहमदने १७ वेळा लुटले होते. या मंदिरात एक बाणस्तंभ आहे. त्या स्तंभावर संस्कृत मध्ये असे कोरले आहे कि या स्तंभापासून अंतर्क्तिका पर्यंत सरळ रेषा मारली तर भूमी लागत नाही. या लेखासोबत त्याच्या लिंक सुद्धा दिल्या आहेत. गुगल map चा फोटो सुद्धा दिला आहे. त्या काळातील लोकांच्याकडे आज असणारी कोणतीही सामुग्री नसताना सुद्धा ते या पद्धतीची घोषणा कशी काय करू शकले असतील ??? आज च्या विज्ञानाकडे याचे उत्तर आहे ??? त्यांनी नक्की कोणती यंत्रे, कोणती तंत्रे वापरली असतील ज्यामुळे त्यांना हे ज्ञान प्राप्त झाले ???

६) मीनाक्षी टेम्पल मदुराई : सुमारे २५०० वर्ष जुने मंदिर. बांधकाम करताना ३० ते ३५ टन वजनाच्या शिळा हत्तींच्या सहाय्याने ढकलत आणून निर्मिती केलेली आहे. या मंदिरात सहस्त्रखंबी मंडप आहे. त्यात ९८५ खांब आहेत आणि त्यातील काही खांबांवर आपण नाणे वाजवले तर सा ते नि असे सप्तसूर ऐकू येतात. मी मध्यंतरी डिस्कव्हरी वर एक कार्यक्रम पाहिला होता ज्यात या मंदिराचे वर्णन आहे. त्यात त्यांना सुद्धा हाच प्रश्न पडला कि २५०० वर्षांच्या पूर्वी ३० टन वजनाचा दगड कसा हलवला असेल. त्या साठी त्यांनी एक दगड आणला सुमारे २५ टन वजनाचा कारण आजच्या वैज्ञानिक दृष्ट्या प्रगत भारतात दगड वाहण्यासाठी असणारा सगळ्यात मोठा ट्रेलर सुद्धा २५ टन वजनच वाहून नेऊ शकतो. आणि जुन्या ग्रंथात लिहिल्याप्रमाणे त्यांनी लाकडी ओंडके तासून गोल केले त्यावर तो दगड टाकून त्यांनी हत्तींचा वापर करून ढकलून पहिले आणि त्यांना तसे करता आले . ( ज्याला आपण तरफ चे तत्व किंवा लिव्हर आर्म प्रिन्सिपल म्हणतो त्याच तत्वाचा वापर करून हि अत्यंत अवजड वस्तू हत्तींनी लीलया ढकलून दाखवली )

७ कोणार्क चे सूर्य मंदिर : संपूर्णपणे लोह्कांत दगड वापरून बनवलेले मंदिर म्हणजे कोणार्क चे सूर्य मंदिर. या मंदिराचे वैशिष्ट्य म्हणजे हे लोह्कांत दगड एकमेकांचे magnetic forces balance करून घट्ट बसवले होते. त्या नंतर त्यावर शिल्पे घडवली. मंदिराचा कळस हा सुद्धा लोह्कांत दर्जाचा होता आणि तो कळस संपूर्ण मंदिराचे magnetic forces control करत असे. या मंदिराच्या आत जे राशी चक्र काढले होते ते या पद्धतीचे होते कि रोज सूर्य उगवताना ज्या राशीत असेल त्या राशीवर बरोबर सूर्याचे पहिले किरण पडणार. अर्थात रोज राशी बदलला अनुसरून किरणांची जागा बदलणार. कल्पना करा याला भूगोल आणि स्थापत्याचा काय दर्जाचा अभ्यास लागला असेल.
या मंदिराची मला माहित असणारी कथा सांगतो. हे मंदिर समुद्र किनाऱ्याच्या जवळ आहे. आणि त्या भागात समुद्र किनारा अत्यंत खडकाळ आहे. या किनाऱ्याजवळ येणारी जहाजे त्यातील लोखंड या magnetic forces ने ओढली जाऊन खडकावर आपटून फुटून जात असत.  ज्यावेळी वास्को द गामा भारतात आला त्याच्या दोन पैकी एका जहाजाचा याच पद्धतीने खडकावर आदळून अंत झाला. त्याला यात मंदिराचा काही तरी परिणाम आहे हे लक्षात आले त्याने जहाजावरून तोफा डागल्या. त्यामुळे मंदिराचा कळस निखळला. कळस निघाल्याने सगळे magnetic forces unbalance झाले आणि मंदिर जवळ जवळ उध्वस्त झाले. नंतर ब्रिटीश कालखंडात ब्रीटीशांना कल्पना होती कि आपण हे मंदिर पूर्ववत करू शकत नाही. त्यांनी मंदिराच्या गर्भगृहात चक्क कॉन्क्रीट ठासून भरले.
आजच्या महान विज्ञान आणि वैज्ञानिकांना आवाहन आहे. ते कॉन्क्रीट काढा आणि पुन्हा ते मंदिर पूर्ववत करून दाखवा.

८हि माझी पोपटपंची नाही. विकिपीडियाच वराह मिहीर चे गणितातील योगदान सांगतो आहे. सदरील ऋषींच्या बद्दल अजून एक ज्ञात बाब म्हणजे ते सूक्ष्म देह धारण करून ( यावर विज्ञानाचा बिलकुल विश्वास नाही ) अंतराळात भ्रमण करत असे. आणि त्यांनी काही श्लोक लिहिले आहेत ज्यात त्यांनी तुम्ही अंतराळात प्रवास करत असला आणि तुम्हाला जिथे आहात तेथून सूर्य अथवा पृथ्वी दोन्ही सुद्धा दिसत नसेल तरीपण आपले लोकेशन ( स्थान ) कसे ओळखावे आणि प्रवास करावा यावर मार्गदर्शन केलेले आहे.

मध्यंतरी डिस्कव्हरीवर मंगलयान सफल झाल्यावर एक कार्यक्रम दाखवला गेला. त्यात नासा पहिली प्रयत्नात का अपयशी झाली याची चर्चा होती. आणि भारत का सफल झाला याचे सुद्धा विवरण होते. मंगलयान मंगल ग्रहाच्या कक्षेत स्थिर करताना एक समस्या वर सांगितल्या प्रमाणेच उद्भवली कि मंगल यान मंगल ग्रहाच्या उलट बाजूला होते. एका बाजूला सूर्य अन दुसऱ्या बाजूला पृथ्वी होती यानाला या पैकी काहीही दिसत नव्हते. या ठिकाणी वराह मिहीर ने सांगितलेली पद्धत वापरून प्रोग्राम बनवला होता आणि तो परफेक्ट होता त्या प्रमाणे मंगल यान सफलपणे मंगळावर उतरले.
आचार्य कणाद ज्यांनी अणु त्याच्या गर्भातील छोटे पार्टिकल यांच्यावर शास्त्रीय भाष्य केलेले आहे. आणि हा लेख वाचा. मी सांगत नाही तज्ञ अश्या पाश्चात्य विद्वानांनी सुद्धा यावर शिक्का मोर्तब केलेलं आहे.
१०) वैदिक गणित, आपले पंचांग आणि त्यावर आधारित पर्जन्य मानाचे अंदाज:
गणित हा भारतीयांनी जगाला दिलेला शोध आहे. शून्यावर आधारित गणमान पद्धती हि भारताची देण आहे. भारतातून हे ज्ञान मध्य पूर्वेला गेले अरब लोकांनी ते युरोपात नेले. त्यामुळे गणिताला युरोपियन लोक अरेबिक म्हणत आणि अरबी लोक हिंदसा म्हणत अर्थात हिंद मधून आलेली गणन पद्धत. यावर आधारित आपले पंचांग हे आज सुद्धा सगळ्यात परफेक्ट आहे. आपल्याकडे पर्जन्यमान दर्शवणारे जितके ग्रंथ आहेत ते नक्षत्रांची स्थिती आणि त्यानुसार पर्जन्य आणि येणारे पिक हा अंदाज वर्तवतात तो अंदाज आपल्या हवामान खात्याच्या अंदाजापेक्षा अधिक चांगला असतो.
११) ज्या विज्ञानाच्या यशाच्या आपण गप्पा मारत असतो त्याचा पाया उत्तम गणिती ज्ञान हा आहे आणि त्यात भारतीय खूप आधी पासून तज्ञ आहेत. आज तुम्ही गणिताचे ऑलिम्पियाड जिंकलेल्या कोणत्याही मुलाला विचारा तू काय करणार तो सांगतो मी पाय चे मूल्य अधिकाधिक चांगले मांडणार. पाय हा वर्तुळाचा व्यास मोजण्यासाठी वापरला जाणारा स्थिरांक आहे.
पाय चे मूल्य ३२ अंशापर्यंत या श्लोकातून समजते. पाय चे मूल्य शुल्बसूत्रातून काढले गेले आहे. आधुनिक विज्ञानाने पाय चे मूल्य २२ अंशापर्यंत काढले आहे.

१२)  आपण गणन करण्यासाठी जी पद्धत वापरतो त्यात इंग्रजी अक्षरात
trillion च्या पुढे गणना नाही. आपल्या पद्धतीत. पद्म, महापद्म, अर्व, खर्व पर्यंत गणन करण्यासाठी शब्द आहेत.

१३) प्राचीन भारतातील हि सात शिव मंदिरे एकाच अक्षांशाला संदर्भ घेऊन बांधली आहेत. सर्व मंदिरे एकमेकांच्या पासून कमीत कमी काही हजार किलोमीटर दूर आहेत. असे असताना त्यांना ती एका रांगेत बांधता आली याचा अर्थ त्यांचे भूगोलाचे आणि अक्षांश आणि रेखांशाचे ज्ञान किती परिपूर्ण होते याचे द्योतक आहे.
मी इथे दिलेली माहिती म्हणजे सागरातील काही थेंब आहेत. शक्यतो प्रत्येक मुद्याचे स्पष्टीकरण सुद्धा देण्याचा प्रयत्न केला आहे. आधुनिक विज्ञान म्हणजे कचरा आहे असे माझे बिलकुल मत नाही. आधुनिक विज्ञानाची दृष्टी वेगळी आहे. प्राचीन ऋषींची दृष्टी वेगळी होती. त्यांच्या दृष्टीत लोककल्याणाची तळमळ अधिक होती. त्यांची दृष्टी अधिक निसर्गपूरक होती. दुर्दैवाने सध्याचे विज्ञान हे निसर्गाला आव्हान देण्यासाठी विकसित होते आहे. भारतीय ऋषींनी विकसित केलेले विज्ञान हे निसर्ग आणि मानव यांनी शांततापूर्वक सहजीवन व्यतीत करावे असे होते.
याठिकाणी मला चीनमधील एक महान विचारवंत कान्फूशियस याचे एक वाक्य उधृत करायचे आहे. तुम्ही निसर्गाच्या नियमांना बांधील राहून काही निर्माण केले तर निसर्ग ते टिकण्यास मदत करतो. तुम्ही निसर्गाला आव्हान देऊन काही निर्माण केले तर निसर्ग ते उध्वस्त करण्याच्या उद्योगाला लागतो. आपले आजचे विज्ञान असे संहारक होऊ लागले आहे आणि त्याचा परिणाम म्हणून आपण पर्यावरणाच्या बदलांशी झुंजतो आहोत. 
मी अध्यात्माच्या मार्गावर चालणारा एक छोटा पांथस्थ आहे. मला स्वतःला प्राचीन विज्ञान आणि अर्वाचीन विज्ञान असा लढा उभा करण्यात काहीही रस नाही.
पण इथे मला एक गोष्ट नमूद करावीशी वाटते आपल्या देशात चार प्रकारचे लोक आहेत. पहिल्या प्रकारात त्यांना भारतीय आणि त्यातल्यात्यात हिंदू म्हणून जन्माला आलो याची लाज वाटते. त्यांना आपले सगळे जुने ज्ञान म्हणजे कचरा वाटतो आणि ते पाश्चिमात्य ज्ञानाच्या प्रेमात पडलेले असतात. दुसऱ्या प्रकारातील लोक स्वार्थी असतात. त्यांना वेद आणि प्राचीन ज्ञान यातील शून्य माहिती असते परंतु काहीही असले तर ते वेदात आहे म्हणून हि मंडळी ठोकून मोकळी होतात. त्यांचे वेद आणि प्राचीन ज्ञानाच्या बद्दलचे प्रेम बेगडी आणि स्वतःची तुंबडी भरणारे आहे. तिसऱ्या प्रकारातील लोक श्रद्धाळू असतात. लोक म्हणतात म्हणजे वेदात काही तरी भारी असेल असा विचार करून ते गप्प बसतात हि पाप भीरु मंडळी असतात. आणि स्वार्थी लोक यांनाच फसवतात. चौथ्या प्रकारात माझ्या सारखे लोक असतात. जे आपली मती वापरून या प्राचीन ज्ञान सागरातील एक दोन थेंब जरी मिळवता आले तरी त्याची चव कृतज्ञपणे चाखतात...
माझा लेख सर्वत्र प्रसारित करण्यास काहीही हरकत नाही..
*( संपुर्ण वैज्ञानिक असलेल्या हिंदू धर्मात माझा जन्म झाला याचा मला अभिमान वाटतो,  )*
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Tuesday, August 7, 2018

निरंतर सफलता के लिए अचुक उपाय - डॉ. सुहास रोकडे

निरंतर सफलता प्राप्त करने के लिए


अपने कार्य क्षेत्र में धन लाभ एवं निरंतर सफलता प्राप्त करने के लिए घर में बनने वाली पहली 3 रोटी गाय , कुत्ते और पक्षियों ( कौओं ) के लिए निकाल कर उन्हें घी और हल्का मीठा लगाकर लगाकर देने से सदैव लाभ ही लाभ की प्राप्ति होती है । बुधवार को गाय को हरी सब्जी चारा एवं गुरुवार को प्रातः तुलसी में थोडा कच्चा दूध डालने से भी उस घर में हमेशा समृद्धि बनी रहती है ।

Dr.Suhas Rokde

Astrologer

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Monday, July 30, 2018

कृष्णवचन

तक्रार करायची का?


महाभारतातील दोन पात्रामधील अतिशय सुरेख संवाद:

कर्ण कृष्णाला विचारतो - " माझा जन्म झाल्याबरोबर माझ्या आईने मला सोडून दिले,
कारण मी अनौरस संतती होतो.
यात माझी काय चूक होती?

मला द्रोणाचार्यांनी शिक्षण नाकारलं,
कारण मी क्षत्रिय नाही मानला जात होतो.

परशुरामांनी मला विद्या दिली, पण मला शाप दिला की ती विद्या मी विसरून जाईल.

कारण मी क्षत्रिय होतो.

एक गाय चुकून माझ्या बाणांनी मारली गेली, आणि
गायवाल्यानी माझी चूक नसताना मला शाप दिला.

द्रौपदीच्या स्वयंवरात मला अपमान सहन करावा लागला.

कुंतीने शेवटी माझे सत्य तिच्या मुलांना वाचवण्यासाठीच सांगितले.

मला जे काही मिळाले ते दुर्योधनाचे उपकार म्हणून मिळाले.
तर मी त्याची बाजू घेतली यात माझे काय चुकले?"

कृष्णाने उत्तर दिले:
"कर्णा, माझा जन्म कारागृहात झाला.

जन्माच्या अगोदरपासूनच मृत्यू माझी प्रतीक्षा करीत होती.

रात्री जन्म झाल्याबरोबर लगेच मला माझ्या आईवडिलांपासून वेगळे करावे लागले.

तुम्ही तलवारी, रथघोडे, धनुष्यबाणांच्या आवाजात लहानाचे मोठे झालात.

मला गौशाला, शेणमाती मिळाली आणि मी चालायला पण लागलो नव्हतो तेव्हापासून माझा जीव घेण्याचे अनेक प्रयत्न केले गेले.

ना कोणती सेना, ना शिक्षण.

मीच त्यांच्या वाईटाचा कारण आहे, असे लोकांकडून मला ऐकायला मिळायचे.

तुमचे गुरु तुमच्या पराक्रमाचे कौतुक करायचे, तेव्हा मला साधे शिक्षण पण मिळाले नाही.

संदीपनी मुनींच्या गुरुकुलात प्रवेश झाला तेव्हा मी 16 वर्षाचा होतो.

तुम्ही तुमच्या पसंदीच्या मुलीशी लग्न केले.

माझं जिच्यावर प्रेम होते ती मला मिळाली नाही, तर ज्यांची मी राक्षसांच्या तावडीतून सुटका केली त्या माझ्या पदरी पडल्या.

मला माझ्या सर्व समाजबांधवांना जरासंधाच्या अत्याचारापासून वाचवण्यासाठी यमुना काठापासून नेऊन समुद्राच्या काठी (द्वारका) वसवावे लागले.
मला पळपुटा (रणछोडदास) म्हणतात.

जर दुर्योधन जिंकला तर तुला भरपूर श्रेय मिळेल.
धर्मराज जिंकला तर मला काय मिळेल, फक्त युद्ध आणि नुकसानीचा दोष.

एक गोष्ट लक्षात घे कर्णा...
प्रत्येकाला आयुष्यात कष्ट आहेत

आयुष्य कोणासाठीही सोपे नाही

दुर्योधनाच्या आयुष्यात बऱ्याचशा अप्रिय घटना घडल्या आहेत आणि तसेच युधिष्ठिराच्या पण.

परंतु काय योग्य (धर्म) आहे हे तुझ्या अंतरात्माला पण कळते...

कितीही वेळा आपल्या बरोबर अयोग्य गोष्टी झाल्या,
किती वेळा आपल्याला अपमान सहन करावा लागला,
कितीही वेळा आपल्याला आपल्या वाटेचे नाकारले गेले,

तरीही
त्यावेळी आपण कसा प्रतिसाद देतो याला महत्व आहे.

तक्रारी थांबव कर्णा!

आयुष्यात घडलेल्या अप्रिय घटनामुळे तुला अधर्म करण्याचा अधिकार मिळत नाही.

म्हणून मित्रानो, तुमच्या आयुष्यात आलेल्या कठीण व अतिवाईट प्रसंगी देखिल तुम्ही चांगलाच विचार करा, चांगलंच वागा आणि प्रत्येक माणसाला आणि प्राण्याला सहकार्य करा. स्वच्छंदी व्हा आणि हे विसरून जा कुणी तुम्हाला वेदना दिली की आनंद...!💐💐💐💐💐

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Thursday, July 26, 2018

गुरु पुर्णिमा - कैसे करे गुरु ? -ज्योतिष्याचार्य डॉ.सुहास


गुरु पूर्णिमा


गुरु नहीं है तो क्या चिंता,
इनको बनाईये अपना गुरु

हनुमानजी


श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार |
बरनौ रघुवर बिमल जसु, जो दायक फल चारि |
बुद्धिहीन तनु जानि के, सुमिरौ पवन कुमार |
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहुं कलेश विकार।

गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा के प्रारम्भ में ही इस दोहे के माध्यम से अपने श्रीगुरु हनुमान जी के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर दी है। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी के साथ ही यह भी बता दिया कि गुरु वंदना से क्या लाभ होते हैं। गुरु से प्रार्थना की, कि वह उनके सारे क्लेश मिटा दें। वास्तव में यही गुरु महिमा है। उपनिषदों से गुरु शब्द की उत्पत्ति हुई है। गु का अर्थ है अज्ञान और रु का अर्थ है अज्ञान को मिटाने वाला, प्रकाश देने वाला। जो अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाए औरजो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए, वही गुरु है। श्रीमदभागवत में भगवान श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि इष्ट से मिलाने का कार्य गुरु ही करते हैं।

किसको बनाएं गुरु, यह सवाल सबको सताता है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर यह आवश्यक नहीं कि किसी व्यक्ति विशेष को ही गुरु बनाया जाए। आप किनको गुरु बना सकते हैं, इसके विकल्प भी मौजूद हैं। संतगण कहते हैं कि गुरु ऐसा हो, जो सदा-सर्वादा के लिए हो। जिसके आप गुण देखें लेकिन दोष नहीं। गुरु को आपको सुलभ हो और आप समय-समय पर मार्ग दर्शऩ भी लेते रहें। यदि आपका कोई गुरु नहीं है तो आप इस प्रकार गुरु पूर्णिमा मना सकते हैं..

श्री हनुमान: जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु हनुमान जी हैं, उसी प्रकार आप भी हनुमान जी को अपना गुरु मान सकते हैं। हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के प्रदाता हैं। वह परम ज्ञानी हैं। परमवीर हैं। संकटमोचन हैं। उनकी शरण में जाने से शिष्यों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

भगवान शिव


शंकर गुरु:, शंभो गुरु:, गुरु उमापती महेश्वर:, l
निराकार गुरु, साकार गुरु, गुरु महाकाल नागेश्वर: ll

हनुमान जी की तरह ही भगवान शंकर को भी आप गुरु बना सकते हैं। भोले बाबा सहज सरल हैं। वह प्रलंयकारी हैं। वह त्रिपुरारी हैं। न वह जटिल और न ही उनकी पूजा। भगवान शंकर को गुरु मानकर पूजा करने से सारे कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। 

भगवान श्रीकृष्ण


आप भगवान श्री कृष्ण को भी अपना गुरु बना सकते हैं। योगीराज श्रीकृष्ण समस्त बाधाओं को दूर करने वाले हैं। वह परमज्ञानी हैं। परमवीर हैं। मददगार हैं। धर्म, अर्थ और मोक्ष के मार्ग दर्शक हैं। आप भगवान विष्णु को भी अपना गुरु बना सकते हैं। श्री गुरुदेव दत्तप्रभु को भी गुरुरुपेन स्विकार करके गुरुचरित्र के १४ अध्याय के ११,पाठ कर ले l पंचपाल का विडा चढाकर नमन करे l

धर्मग्रंथ- नवग्रह

धर्मग्रंथ केवल पठन-पाठन और वाचन तक सीमित नहीं हैं। धर्मग्रंथ हमको आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। पग-पग पर हमारा मार्ग दर्शऩ करते हैं। इसलिए, श्रीरामचरित मानस, भगवद्गीता आदि को आप गुरु मानकर पूज सकते हैं। इसी तरह नवग्रहों में से किसी एक को भी आप अपना गुरु बना सकते हैं।

कैसे लें गुरु दीक्षा ?

व्यक्तिगत गुरु दीक्षा तो आपके गुरु ही दिलाते हैं। लेकिन यदि आप अपने इष्ट को गुरु की संज्ञा देना चाहते हैं तो बहुत ही सरल उपाय है। हाथ में चावल, गंगाजल और कुछ दक्षिणा रखकर संकल्प लें और मंत्र पढें...ऊं गुरुवे नम:, ऊं हरि ऊं। मन ही मन संकल्प लें कि आज से आप हमारे गुरु हैं। हमने आप से दीक्षा ली हैं। हमारे घर परिवार में सुख-शांति बनाएं और हमारा कल्याण करें। हनुमान जी को गुरु बनाने वाले गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु पूजन करें या कराएं, चोला चढाएं। इसी तरह भगवान शंकर, भगवान विष्णु और भगवान श्रीकृष्ण भक्त गुरु पूजन कराएं। अंत मे क्षमा याचना प्रार्थना कर ले l

जय गुरुदेव !

-ज्योतिष्याचार्य डॉ.सुहास रोकडे
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Wednesday, July 25, 2018

कलीयुग विचारक हरी

कृष्णाने सांगितलेले कलियुग काय आहे? 


एकदा चार पांडव (युधिष्ठीर वगळता) भगवान श्रीकृष्णाला विचारतात- "कलियुग काय आहे आणि कलियुगात काय होईल?"
       या प्रश्नावर कृष्ण हसला आणि म्हणाला,"कलियुगात काय परिस्थिती असेल त्याचे मी तुम्हाला प्रात्यक्षिक दाखवतो.
      " असे म्हणून त्याने आपल्या भात्यातून चार बाण घेतले आणि धनुष्याच्या सहाय्याने चार वेगळ्या दिशेला सोडले आणि चारही पांडवांना ते बाण घेवून येण्याची आज्ञा दिली. 
       सर्व चारही पांडव बाणाच्या शोधात वेगवेगळ्या दिशेने गेले.
        जेव्हा अर्जुनाने बाण शोधून तो उचलला तेव्हा त्याला मंजुळ आवाज ऐकूआला तो त्या आवाजाकडे वळला त्याने पाहिले एक कोकिळा खूप गोड आवाजात गात आहे पण त्याचवेळी जिवंत सशाचे मांस खात आहे, तो ससा खूप वेदना सहन करत आहे. 
       या दैवी पक्षीचे हे घृणास्पद कृत्य पाहून अर्जुनाला धक्का बसला त्याने ते ठिकाण पटकन सोडले.
       भीमाने ज्या ठिकाणाहून बाण उचलला त्या ठिकाणी पाच विहिरी होत्या. 
       एका विहरीभोवती चार विहीरी होत्या. 
       चार विहिरीतील गोड पाणी त्यांच्यात साठून राहू शकत नसल्याने त्या विहिरीबाहेर पडत आहे.
       पण आश्चर्याची बाब म्हणजे या चारही विहीरी पूर्ण भरून वाहत असताना मात्र मधे असेलेली विहीर कोरडी होती.
       हे पाहून भीम चक्रावून गेला.
      नकूल जेव्हा बाण घेवून माघारी येत होता तेव्हा त्याने एक ठिकाणी पाहिले की एक गाय वासराला जन्म देत आहे. 
       जन्म दिलेल्या वासराला ती गाय चाटू लागली. 
       पण ते वासरू स्वच्छ झाले तरी गाय चाटतच राहते.
      खूप मुश्किलीने लोक त्या वासराला गायीपासुन वेगळे करू शकले. 
      तेव्हा ते वासरू खूप जखमी झाले होते. 
      हे पाहून नकूल गोंधळून गेला.
      सहदेवाने एका डोंगराजवळून बाण उचलला आणि पाहिले एक मोठ्ठी शिळा खाली कोसळत आली.
      ती शिळा खाली येताना वाटेत येणाऱ्या मोठमोठ्या झाडांचा, दगडांचा चुराडा करत होती पण तीच शिळा एका लहान रोपामुळे थांबली.
      यावेळी सहदेवही चकीत झाला.
      या चौघांनी या सर्व घटनांचा अर्थ श्रीकृष्णाला विचारला. 
      श्रीकृष्ण हसला आणि अर्थ सांगितला. 
     "कलियुगात धर्मगुरूंचा आवाज खूप मधूर असेल आणि खूप ज्ञानही असेल पण ते साधकांचे शोषण करतील जसं कोकिळा त्या सशाचे करत होती.
      कलियुगात गरीब लोक श्रीमंतांसोबत राहतील.
      श्रीमंताकडे खूप धन असेल ठेवायला जागा नसेल पण ते त्यातील एक कवडीसुद्धा गरीबांना देणार नाहीत जसं त्या विहिरींनी कोरड्या विहिरीला एक थेंबसुद्धा दिला नाही.
      कलियुगात पालक मुलांवर एवढं प्रेम करतील की त्या प्रेमाने मुलं बिघडतील आणि त्यांचे आयुष्य उध्वस्त होईल जसं त्या गायीचे प्रेम वासराला त्रासदायक ठरले.
       कलियुगात माणसे चारित्र्याच्या बाबतीत खूप घसरतील जसे ती शिळा डोंगरावरून घसरली आणि त्यांचे अधःपतन काही केल्या थांबणार नाही पण सर्वात शेवटी देवाचे नाम त्यांचे संरक्षण करील, त्यांचा उद्धार होईल जसं त्या लहान रोपाने त्या शिळेला आणखी खाली जाण्यापासुन रोखले."

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Friday, July 6, 2018

Secret of brain washing

             vyanky
हे आर्टिकल थोडे मोठे आहे, मात्र जे लोकं स्वतःला जागरूक नागरिक समजतात त्यांनी हा लेख जरूर वाचावा.
How to brainwash a nation?
'रावणाचे ग्लोरिफिकेशन' ह्या विरोधात मी फेसबुकवर दोन पोस्ट्स केल्या होत्या. त्यानंतर एका ग्रुपवर ह्या विषयावर चर्चा चालू होती. एकंदरीतच रामाला आपल्या देशात विरोध कसा काय होऊ शकतो हा मुद्दा होता. त्या ग्रुपवर सौरभ वैशंपायनने त्यावेळी 'सबवर्जन' हा विषय काढला. सबवर्जन सोबत जोडून नाव आलं - 'युरी बेझमेनोव्ह' उर्फ 'टॉमस शुमन'.
युरी बेझमेनोव्ह ह्या माणसामध्ये इंटरेस्ट निर्माण झाला आणि त्याविषयी अव्हेलेबल असलेले सर्व व्हिडीओज शोधून काढले, डाउनलोड करून बघितले.
युरीने जे काही मांडले आहे, त्याने डोकं चक्रावून गेलं.
"ऑ!! असंही असू शकतं? हे सर्व इतकं प्लॅनड असू शकतं?" ह्या प्रश्नाने भंडावून जायला झालं.
भारतात सध्या जे चालू आहे आणि आधी जे काही झाले आहे त्याच्यामागे असलेली स्ट्रॅटेजी युरीने त्याच्या ३० वर्षांपूर्वी दिलेल्या मुलाखतीमध्ये मांडली आहे. त्यामुळे त्याने सांगितलेल्या मुद्द्यांना खूप महत्व आहे.
त्याने काय सांगितलं आहे ह्याधी युरी बेझमेनोव बद्दल थोडसं.
युरी हा रशियाच्या गुप्तहेर संघटनेचा म्हणजेच 'केजीबी'चा सदस्य. त्याचा जन्म १९३९साली मॉस्कोमध्ये झाला. त्याचे वडील रशियन सैन्यात होते, त्यामुळे कम्युनिस्ट छळवादी राजवटीत सामान्य जनतेपेक्षा युरीचं बालपण चांगलं गेलं.
कॉलेजात असताना राजकारण आणि भारत ह्या दोन गोष्टींचा त्याने विशेष अभ्यास केला.
नंतर १९६० च्या दशकात युरी रशियाच्या केजीबी ह्या गुप्तहेर संस्थेत रुजू झाला. भारताविषयी अभ्यास असल्यामुळे केजीबीतर्फे त्याची नेमणूक भारतात करण्यात आली.
गुप्तहेरी करण्यासाठी युरी भारतात संपादक बनून आला. नंतर भारताच्या, इथल्या माणसांच्या, संस्कृतीच्या प्रेमात पडला. केजीबी जगभरात आणि भारतात जर काही करते आहे ते खूप चुकीचं आहे, कम्युनिस्टांच्या स्वार्थासाठी इतर देशांचा, तिथल्या लोकांच्या बळी जात आहे, ह्या जाणिवेने त्याने केजीबीला सोडचिठ्ठी दिली. जीव वाचवण्यासाठी भारतात हिप्पी बनून राहिला आणि नंतर कॅनडाला पळून गेला. १९९३ च्या सुमारास त्याचा मृत्यू झाला. कसा ते कुणालाच समजलं नाही.Deception was my job" गुप्तहेर म्हणून तो करत असलेल्या कामाचं स्वरूप युरीने एका वाक्यात मांडलं आहे.
खोटं असलेलं खरं बनवून दाखवणं, समाजाला भुरळ पाडणं, आपल्या बोलावत्या सरकारला हवं ते चित्र उभं करणं आणि परक्या राष्ट्रांमध्ये जनमत आपल्याला हवं त्या बाजूला वळवणे, हे काम युरी आणि त्याच्यासारखे अनेक गुप्तहेर करत होते आणि आजही करत आहेत.
ह्या सर्वाला त्याने 'सबव्हर्ट' हा शब्द वापरला आहे. 
सबवर्जन हेच युरी आणि अनेक गुप्तहेरांचं काम आहे.
हि सबवर्जनची थिअरी 'सुन त्झे' ह्या एका चायनीज विद्वानाने २००० वर्षांपूर्वी मांडली.
रक्ताचा एक थेंब देखील न सांडता शत्रूला काबीज करणं, त्याच्या देशात आपल्याला अनुकूल मत पैदा करणं आणि मग हळूहळू शत्रूला काबीज करून घेणं हा ह्या थिअरी मागचा गाभा आहे.
आता हे सर्व करायचं तर त्याची एक विशिष्ट पद्धत असायला हवी, त्याची एक मेथेडॉलॉजी असायला हवी. इतर देशांवर कंट्रोल करण्यासाठी केजीबी जे काही करत होती, किंवा आजही अनेक देश जे काही करत आहेत त्याची तपशीलवार माहिती युरीने त्याच्या मुलाखतीत दिली आहे. इंटेरेस्टिंगली सबवर्जन हि एक लॉंग प्रोसेस आहे आणि ह्या सर्व देशांकडे ती अमलात आणण्यासाठी लागणारा संयम आहे.
एखाद्या देशात राजकीय, आर्थिक वा सामाजिक अस्थैर्य निर्माण करणं हा सबवर्जनचा उद्देश आहे. गुप्तहेर संघटनांच्या बजेटपैकी ८५% निधी ह्यासाठी वापरला जातो.
जिथे सामाजिक सीमारेषा फार मजबूत नसतात, जिथे समाज हा फार जास्त विचारी नसतो, जिथे देशाचे राज्यकर्ते स्खलनशील असतात,  राजकीय नियंत्रण फार कमी असतं, त्या देशांना अश्या पद्धतीने नियंत्रणात आणणं फार सोपं असतं.
सबवर्जनमध्ये असणारी एकेक पायरी बघितली तर कोणत्याही सजग नागरिकाला ती पायरी उदहरणासाहित उमजून जाईल.
Demoralisation अर्थात समाजाचं खच्चीकरण करणे, हि एक पायरी त्यात आहे.
ह्यासाठी १५ ते २० वर्षांचा कालावधी आहे. एवढाच का? कारण ह्या कालावधीत एक पिढी शाळा कॉलेजचे शिक्षण घेऊन बाहेर पडते. त्यावेळी आपल्याला हवे असलेली मूल्य त्यांच्यावर बिंबवली तर त्यांचा कल बदलता येतो. कोवळ्या मनांवर आपली मतं लादणे आणि आपल्याला हवा तो प्रोपोगंडा राबवणं हे ह्या पायरीत केलं जातं. मग त्यांच्या पुस्तकात चुकीची माहिती छापणे हाही त्यातलाच एक भाग. उदाहरण डोळ्यासमोर आलं असेलच.
ह्याशिवाय समाजाचे असे जे आदर्श आहेत, ज्यांच्यावर सामान्यजन श्रद्धा ठेवून आहेत, त्यांना धक्का देणं, त्यांच्याविरुद्ध चुकीची विद्रोही माहिती पसरवणे हाही एक अजेंडा. असं झालं कि मग कर्ण चांगला वाटू लागतो, रावण हाही भाऊ असावा असा वाटतं आणि महिषासुर दिन साजरा केला जातो. समाजाला आपले मूळ आदर्श विसरायला लावणं हा हेतू साध्य होऊ लागतो.
धार्मिक मान्यता, शिक्षणपद्धती, सामाजिक जीवन, अडमिनिस्टरेशन सिस्टीम, कायदा आणि सुव्यवस्था, कामगार यंत्रणा गढूळ करून असंतोष पैदा करणं हा देखील ह्याच पायरीचा भाग. मग त्यात आजूबाजूला चालू असलेल्या वेगवेगळ्या देशविरोधी, समाजघातक चळवळींना पाठिंबा दिला जातो.
वैचारिक दृष्ट्या सक्षम असलेल्या लोकांपेक्षा अविचारी, आततायी, प्रसिद्धीलोलुप लोकांना हेरून मोठं केलं जातं.
त्यात 'मीडिया' हा एक मोठा भाग हातात घेतला जातो. सर्वसामान्य दर्जाचे पत्रकार समाजाचा आणि देशाचा आवाज बनवले जातात. खोट्या आणि एकसुरी बातम्या मीडियामधून वारंवार प्रसारित केल्या जातात. समाजात अस्थैर्य निर्माण होईल असे सर्व प्रयत्न मिडियाद्वारे करवले जातात.
राजकीय सत्ता आणि न्यायव्यवस्था गढूळ केल्या जातात. पद्धतशीर रित्या गुंडांचं ग्लॅमरायझेशन केलं जातं. गुंड प्रवृत्तीची माणसं हीच हिरो वाटायला लागतात. सत्शील, सदप्रवृत्त माणसाला बावळट आणि कुचकामी ठरवलं जातं. गुंड हे समाजशोषक नसून त्यांच्या परिस्थितिचे बळी आहेत, असं भासवलं जातं.
अतिसामान्य वकुबाची माणसं समाजाचं नेतृत्व हातात घ्यायचा प्रयत्न करतात.
शिक्षणाचं केंद्र असणारी कॉलेजेस अथवा विद्यापीठं ह्यात शिक्षण दुय्यम केलं जातं आणि प्राचार्य आणि विद्यार्थी, सरकार आणि विद्यार्थी ह्यांच्यात बेबनाव माजवला जातो.
स्त्रीवादि, समलिंगी, विद्यार्थ्यांच्या चळवळी उभ्या राहतात. समाजाला अचानकरीत्या त्यांच्या हक्कांची जाणीव होऊ लागते.
एकंदरीत समाजात अशांतता माजवण्याचे, परकीय विचारसरणी बिंबवण्याचे शक्य तेवढे प्रयत्न केले जातात.
ह्यालाच युरी 'Destabilization' असं म्हणतो.
Destabilization नंतर राजकीय कंट्रोल आणि मग आपल्याला हवा असलेला अजेंडा त्या देशात राबवणे.
एकदा समाजाचा कंट्रोल हाती आला कि समाजातील जी काही प्यादी अशांतता माजवण्यास उपयोगी पडलेली असतात त्यांनाच पद्धतशीररीत्या संपवलं जातं.  नवीन राज्यकर्त्यांना त्या व्यक्तींची वा चळवळीची गरज राहिलेली नसते.
सबवर्जनसाठी उपयोगी पडणार्या सामाजिक घटकांची एक यादीच युरीने एका दुसरया इंटरव्ह्यूमध्ये दिली आहे.  हि यादी ऐकली/ वाचली तर धक्काच बसेल.
चित्रपटक्षेत्रातली मंडळी, स्वत:ला बुद्धिवादी म्हणवून घेणारे लोकं, स्वत:भोवती वलय उभं करून स्वत:चं  महत्व समाजात वाढवणारे स्वार्थी खोटारडे लोकं ह्यांचा उपयोग समाजात अस्थैर्य  निर्माण करण्यासाठी केला जातो.
युरी म्हणतो, ह्या सर्वाला थांबवायचा उपाय आहे. आणि तो म्हणजे हे चालू होत असतानाच थांबवणे. ज्यावेळी समाजाची बेसिक मुल्य परदेशीमूल्यांच्या पंखाखाली जाऊ लागतात त्या आधीच ते थांबवणं महत्वाचं असतं.
भारतात लहान मुलांच्या पुस्तकात चुकीचा इतिहास छापून येतो, त्यांच्या कोवळ्या मनावर आणि बुद्धीवर फुटीरतेचे संस्कार केले जातात, अचानक कुणीतरी कोलेजातली मुलं एकदम मोठी होतात, त्यांना समाजाचं नेतृत्व मानलं जातं, मीडियातून एकाच बाजूच्या बातम्यांचा मारा होतो, चित्रपट क्षेत्रातली मंडळींना देश आपला वाटेनासा होतो- ह्या आणि अशा अनेक घटनांचं जणू भाकीत युरीने आपल्या मुलाखतीत मांडलं आहे.
आपल्या देशातल्या घटना असो वा इजिप्तमधली सो कॉल्ड राज्यक्रान्ति- सर्वांचा क्रम एकसारखा आहे.
रशियासारख्या देशाच्या एका एजंटने हि माहिती उघड उघड मांडली आहे. ह्यापलीकडे चालणार्या अनेक गोष्टी आपल्यासारख्या सामान्य माणसांच्या बुद्धीच्या पलीकडे असतील आणि त्या आपल्याला उभ्या आयुष्यात समजणार देखील नाहीत.
एखादा माणूस जीव तोडून सत्य लोकांसमोर आणायचा प्रयत्न करतो पण आपल्यावर असलेल्या खोट्याच्या प्रभावामुळे आपण सत्य स्वीकारत नाही. ह्याच गोष्टीला युरीने ideological subversion असं म्हंटलं आहे.
त्यामुळे समाजात घडणाऱ्या घटनांनी आपण जर भारावून जात असू किंवा त्याच बरोबर आहेत हे आपल्याला वाटत असेल तर आपण 'सबवर्ट' झालो आहोत, असत्याचा

References- युरी बेझमेनोव्हच्या मुलाखती

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