Thursday, March 12, 2015

प्रेमराशी..

मेष राशि : जिन लोगों की राशि मेष है, उन लोगों की लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

मेष राशि के लोगों के लिए कुंभ, तुला या मिथुन राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।

वृष, कन्या या मकर राशि के लोगों के साथ मेष राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।

मेष राशि के लोगों के लिए वृश्चिक, मीन या कर्क राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं

वृष राशि:
वृष राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

यदि किसी व्यक्ति की राशि वृष है और वह कर्क, वृश्चिक या मीन राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।

जिन लोगों की राशि वृष है, उनके लिए मेष, सिंह या धनु राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।

वृष राशि के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है

मिथुन राशि

मिथुन राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

यदि किसी व्यक्ति की राशि मिथुन है और वह मेष, धनु या सिंह राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।

जिन लोगों की राशि मिथुन है, उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।

मिथुन राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है

कर्क राशि

जिन लोगों की राशि कर्क है, उन लोगों की लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

कर्क राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।

मिथुन, तुला या कुंभ राशि के लोगों के साथ कर्क राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।

कर्क राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती है

सिंह राशि

सिंह राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

यदि किसी व्यक्ति की राशि सिंह है और वह मिथुन, तुला या कुंभ राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।

जिन लोगों की राशि सिंह है, उनके लिए वृष, कन्या या मकर राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।

सिंह राशि के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है

कन्या राशि

जिन लोगों की राशि कन्या है, उन लोगों की लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

कन्या राशि के लोगों के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।

मेष, सिंह और धनु राशि के लोगों के साथ कन्या राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।

कर्क राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं

तुला राशि

तुला राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

यदि किसी व्यक्ति की राशि तुला है और वह मेष, सिंह या धनु राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।

जिन लोगों की राशि तुला है, उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।

तुला राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है

वृश्चिक राशि

जिन लोगों की राशि वृश्चिक है, उन लोगों की लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

वृश्चिक राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।

मिथुन, तुला या कुंभ राशि के लोगों के साथ कन्या राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।

वृश्चिक राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं

धनु राशि

धनु राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

यदि किसी व्यक्ति की राशि धनु है और वह मिथुन, तुला या कुंभ राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।

जिन लोगों की राशि धनु है, उनके लिए वृष, कन्या या मकर राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।

धनु राशि के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है

मकर राशि

जिन लोगों की राशि मकर है, उन लोगों की लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

मकर राशि के लोगों के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।

मेष, सिंह या धनु राशि के लोगों के साथ मकर राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।

मकर राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं

कुंभ राशि

कुंभ राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

यदि किसी व्यक्ति की राशि कुंभ है और वह मेष, सिंह या धनु राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।

जिन लोगों की राशि कुंभ है, उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।

कुंभ राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है

मीन राशि

जिन लोगों की राशि मीन है, उन लोगों की लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।

मीन राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।

मिथुन, तुला और कुंभ राशि के लोगों के साथ मीन राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।

मीन राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं

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Tuesday, March 10, 2015

कैसे करे ईश्वर परिक्रमा ?

 है.सभी देवताओं की परिक्रमा के संबंध में अलग-अलग नियम बताए गए हैं.

1. – महिलाओं द्वारा “वटवृक्ष” की परिक्रमा करना सौभाग्य का सूचक है.

2. – “शिवजी” की आधी परिक्रमा की जाती है.है शिव जी की परिक्रमा करने से बुरे खयालात और अनर्गल स्वप्नों का खात्मा होता है।भगवान शिव की परिक्रमा करते समय अभिषेक की धार को न लांघे.

3. – “देवी मां” की एक परिक्रमा की जानी चाहिए.

4. – “श्रीगणेशजी और हनुमानजी” की तीन परिक्रमा करने का विधान है.गणेश जी की परिक्रमा करने से अपनी सोची हुई कई अतृप्त कामनाओं की तृप्ति होती है.गणेशजी के विराट स्वरूप व मंत्र का विधिवत ध्यान करने पर कार्य सिद्ध होने लगते हैं.

5. – “भगवान विष्णुजी” एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए.विष्णु जी की परिक्रमा करने से हृदय परिपुष्ट और संकल्प ऊर्जावान बनकर सकारात्मक सोच की वृद्धि करते हैं.

6. – सूर्य मंदिर की सात परिक्रमा करने से मन पवित्र और आनंद से भर उठता है तथा बुरे और कड़वे विचारों का विनाश होकर श्रेष्ठ विचार पोषित होते हैं.हमें भास्कराय मंत्र का भी उच्चारण करना चाहिए, जो कई रोगों का नाशक है जैसे सूर्य को अर्घ्य देकर “ॐ भास्कराय नमः” का जाप करना.देवी के मंदिर में महज एक परिक्रमा कर नवार्ण मंत्र का ध्यान जरूरी है.इससे सँजोए गए संकल्प और लक्ष्य सकारात्मक रूप लेते हैं.

परिक्रमा के संबंध में नियम
१. – परिक्रमा शुरु करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए.साथ परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरु की गई थी.ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नही मानी जाती

२. – परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत कतई ना करें.जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें.

३.- उलटी अर्थात बाये हाथ की तरफ परिक्रमा नहीं करनी चाहिये.

इस प्रकार देवी-देवताओं की परिक्रमा विधिवत करने से जीवन में हो रही उथल-पुथल व समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाता है.इस प्रकार सही परिक्रमा करने से पूर्ण लाभ की प्राप्ती होती है.

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Wednesday, March 4, 2015

Computer Literature - Dr.Suhas

Astrologer Dr.Suhas R.: http://pothi.com/pothi/book/ebook-dr-suhas-rokde-mcmph-d-computer-literature-0#sthash.mRIPpv2I
A sixth ebook recently published for all Computer  Readers & Competitive aspirants title
'Computer Literature'
Author : Dr.Suhas Rokde
I hope all likes as previous title. Thanks

Wednesday, February 18, 2015

सावधान ! मन बहुरुपीयॉ है....

सुप्रभातम्....
सावधान! बड़ा बेबस बना सकता है मन     
समर्पण हुआ, तो निश्चित ही साक्षी भाव की अनुभूति होगी और साधक अपने स्वरूप में अवस्थित होगा। पर यदि समर्पण न हो सका तब? इस प्रश्र का उत्तर महर्षि पतंजलि अपने अगले सूत्र यानि कि समाधि पाद के चौथे सूत्र में देते हैं। वह कहते हैं-
वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥ १/४॥
साक्षी होने के अलावा अन्य सभी अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है। ये वृत्तियाँ साधक की अन्तर्चेतना को मनचाहा भटकाती हैं। सुख- दुख के सपने दिखाती हैं। कभी हँसाती हैं, कभी रुलाती हैं। इच्छाओं के कच्चे धागों से बाँधती हैं। कल्पनाओं और कामनाओं की मदिरा पिला कर बेहोश करती हैं।
        साक्षी होने के अतिरिक्त अन्य सभी अवस्थाओं का यही सत्य है। जिसे हम सभी किसी न किसी रूप में रोजमर्रा की जिन्दगी में अनुभव करते रहते हैं। मजे की बात तो यह है कि यदा- कदा हम में से कई या यूं कहें कि प्रायः हम सभी इन्हीं कामनाओं की तृप्ति के लिए साधना भी करने लगते हैं। गाढ़ी बेहाशी को और गाढ़ा करने के लिए जप- तप का सिलसिला शुरू करते हैं। इसकी सफलताओं पर खुशियों की अठखेलों से खेलते हैं और असफल होने पर गम के आँसूओं से अपने- आपको भिगोते हैं। वृत्तियों का यह बहुरंगी तमाशा हमारे जीवन का सामान्य परिचय है। इसमें स्वप्न तो अनेक हैं, सत्य एक भी नहीं। इसी तथ्य का संकेत महर्षि के सूत्र में है।
         परम पूज्य गुरुदेव महर्षि पतंजलि के बारे में कहा करते थे कि वे अद्भुत हैं। वे साधक को तपाने में, उससे साधना कराने में विश्वास करते हैं। उनका इधर- उधर की कहानियाँ- किस्से सुनाने में कतई विश्वास नहीं है। बहलाने- फुसलाने में उनका कोई यकीन नहीं है। एक प्रसंग में गुरुदेव के सामने जब इस सूत्र की चर्चा चली, तो उन्होंने कहा- ‘अब यहीं देखो कैसी दो टूक बात कह दी उन्होंने। साधकों के सामने बिलकुल बात साफ कर दी कि या तो साक्षी भाव को उपलब्ध कर अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाओ या फिर वृत्तियों के साथ तादात्म्य करके भटकते रहो। इन दो के अलावा कोई तीसरी सच्चाई नहीं हो सकती। जान सको तो जानो, मान सको तो मानो।’
         गुरुदेव कहा करते थे, पतंजलि के सूत्र तो साधकों के लिए भेजे गए टेलीग्राम हैं। इनमें इधर- उधर का एक भी फालतू शब्द नहीं है। कभी- कभी तो एक सूत्र पूरा वाक्य तक नहीं है। वह तो अल्पतम सारभूत है। ये सूत्र ऐसे हैं, जैसे कोई तार करने जाय और वहाँ बेकार के अनावश्यक शब्द काट दे। तार का मतलब ही यही है, कम से कम शब्दों में सम्पूर्ण सन्देश कह दिया जाय। तार की जगह अगर पत्र लिखा जाता, तो शायद दस पन्नें भरने के बावजूद बातें पूरी न हो पाती। लेकिन एक तार में, दस शब्दों में वह केवल पूरा ही नहीं होता, बल्कि पूरे से भी थोड़ा अधिक होता है। वह सीधी हृदय पर चोट करता है। उसमें सारतम होता है।
        इसी प्रसंग में गुरुदेव ने यह भी बताया कि उनकी मार्गदर्शक सत्ता ने भी उनसे बड़ी सीधी- सपाट भाषा में एकदम थोड़े शब्दों में कहा था, साधना करनी है, तो इन्द्रिय सुखों से मुँह मोड़ना होगा। एकदम रूखी- सूखी जिन्दगी जीनी होगी। ये बातें बताकर वह थोड़ा रूके, फिर कहने लगे- यह तो बाद में पता चला कि इस रूखे- सूखे पन में आनन्द की अनन्तता समायी है। बस यही बात महर्षि पतंजलि के बारे में है। वह बहुत ही रूखी- सूखी धरती पर ले चलेंगे, मरुस्थल जैसी भूमि पर। लेकिन मरुस्थल का अपना सौन्दर्य है। उसमें वृक्ष नहीं होते, उसमें नदियाँ नहीं होती, लेकिन उसका एक अपना विस्तार होता है। किसी जंगल की तुलना उससे नहीं की जा सकती। जंगलों का अपना सौन्दर्य है, पहाड़ियों का अपना सौन्दर्य है, नदियों की अपनी सुन्दरताएँ हैं। मरुस्थल की अपनी विराट् अनन्तता है। हाँ, इस राह पर चलने के लिए हिम्मत की जरूरत है। पतंजलि का हर सूत्र साधकों के साहस के लिए चुनौती है। उनके विवेक को सावधान रहने की चेतावनी है।
               पतंजलि बिलकुल साफ तौर पर कहते हैं कि यदि आपको, हमको, मनुष्य मात्र को यदि भटकन, उलझन, तनाव, चिन्ता, दुःख, पीड़ा, अवसाद से सम्पूर्ण रूप से मुक्ति पानी है, तो साक्षी भाव को उपलब्ध होने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है। क्योंकि अन्य अवस्थाओं में तो मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य बना ही रहेगा। मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है। यह बात किसी एक पर, किसी व्यक्ति विशेष पर लागू नहीं होती। बात तो सारे मनुष्यों के लिए कही गयी है। मानव प्रकृति की बनावट व बुनावट की यही पहचान है। साक्षी के अतिरिक्त दूसरी सभी अवस्थाओं में मन के साथ तादात्म्य बना रहता है।

निद्रा साधना शक्ती

नींद, जब आप होते हैं केवल आप             सम्भावनाएँ केवल विभु में ही नहीं, अणु में भी है। पर्वत में ही नहीं, राई में भी बहुत कुछ समाया है। जिन्हें हम तुच्छ समझ लेते हैं, क्षुद्र कहकर उपेक्षित कर देते हैं, उनमें भी न जाने कितना कुछ ऐसा है, जो बेशकीमती है। जागरण के महत्त्व से तो सभी परिचित हैं। महर्षि कहते हैं कि निद्रा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। चौथी वृत्ति के रूप में इसके स्वरूप और सत्य को समाधिपाद के दसवें सूत्र में उद्घाटित करते हैं-
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १/१०॥
    शब्दार्थ- अभाव अभाव की प्रतीति को आश्रय करने वाली; वृत्तिः =वृत्ति; निद्रा=निद्रा है।
अर्थात् मन की यह वृत्ति, जो अपने में किसी विषय वस्तु की अनुपस्थिति पर आधारित होती है- निद्रा है। यही निद्रा ही सार्थक और यथार्थ परिभाषा है। नींद के अलावा हर समय मन अनेकों विषय वस्तुओं से भरा रहता है। भारी भीड़ होती है मन में। विचारों की रेल- पेल, अन्तर्द्वन्द्वों की धक्का- मुक्की क्षण- प्रतिक्षण हलचल मचाए रहती है। कभी कोई आकांक्षा अंकुरित होती है, तो कभी कोई स्मृति मन के पटल पर अपना रेखा चित्र खींचती है, यदा- कदा कोई भावी कल्पना अपनी बहुरंगी छटा बिखेरती है। हमेशा ही कुछ न कुछ चलता रहता है। यह सब क्षमता तभी होती है, जब सोये होते हैं गाढ़ी नींद में। मन का स्वरूप और व्यापार मिट जाता है, केवल होते हैंआप—बिना किसी उपाधि और व्याधि के।
      परम पूज्य गुरुदेव कहते थे- नींद के क्षण बड़े असाधारण और आश्चर्य जनक होते हैं। कोई इन्हें समझ ले और सम्हाल ले, तो बहुत कुछ पाया जा सकता है। ऐसा होने पर साधकों के लिए यह योगनिद्रा बन जाती है, जबकि सिद्धजन इसे समाधि में रूपान्तरित कर लेते हैं। दिन के जागरण में जितनी गहरी साधनाएँ होती हैं, उससे कहीं अधिक गहरी और प्रभावोत्पादक साधनाएँ रात्रि की नींद में हो सकती है। वैदिक संहिताओं में अनेकों प्रकरण ऐसे हैं, जिनसे गुरुदेव के वचनों का महत्त्व प्रकट होता है।
      ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में कुशिक- सौभर व भारद्वाज ऋषि ने रात्रि की महिमा का बड़ा ही तत्त्वचिंतन पूर्ण गायन किया है। इस सूक्त के आठ मंत्र निद्रा को अपनी साधना बनाने वाले साधकों के लिए नित्य मननीय है। इनमें से छठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं- ‘यावयावृक्यं वृकं यवय स्तेनभूर्म्ये। अथा नः सुतरा भव’॥ ६॥ ‘हे रात्रिमयी चित् शक्ति! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को अलग करो। काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ। तदन्तर हमारे लिए सुख पूर्वक तरने योग्य बन जाओ। मोक्षदायिनी एवं कल्याणकारिणी बन जाओ।’
       ये स्वर हैं उन महासाधकों के, जो निद्रा को अपनी साधना बनाने के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ाते हैं। वे जड़ता पूर्ण तमस् और वासनाओं के रजस् को शुद्ध सत्त्व में रूपान्तरित करते हैं। और निद्रा को आलस्य और विलास की शक्ति के रूप में नहीं, जगन्माता भगवती आदि शक्ति के रूप में अपना प्रणाम निवेदित करते हुए कहते हैं-
या देवी सर्वभूतेषु निद्रा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
देवी सप्तसती ५/२३- २५
शुभ रात्री...🙏

Monday, February 16, 2015

महाशिवरात्री पुजन विधान -डॉ सुहास रोकडे

महाशिवरात्री पुजन विधी

खालील सर्व १० विधींसाठी नित्य पूजन पुस्तिका अथवा /www.astrotechlab.com or http:/astrotechlab.blogspot.in वर संपर्क साधावा.
१) पवित्रीकरण २) आचमन ३) पृथ्वीपूजन ४) दिगबंधन ५) संकल्प ६) गणेश पूजन स्थापना ७) शिवालिंग स्थापना एवंम् शिवाभिषेक ८) बिल्वार्पन ९) आरती १०) क्षमाप्रार्थना शिवपूजन, जपास
महानिशिथकाल दि.१३-२-२०१८ला रात्री 12.28 ते रात्री 1.18 असुन यासमयी श्री सांब सदाशिवाय नम: या मंत्राने शिवपूजनास अधिक महत्व आहे. या दिवशी पुर्ण दिवस उपवास व विवाहीतांनी एकभुक्ती पाळावी.
प्रहरानुरुप मंत्र जप
श्री शिवाय नम:6.17-9.26pm
श्री शंकराय नम: 9.30-12.33pm श्री महेश्वराय नम: 12.33-3.35 am श्री रुद्राय नम: 3.35 am यासोबत शिवलिलामृत अथवा याचा ११ अध्याय तरी अवश्य वाचावा. फलश्रृती या व्रताने मनोकामनापुर्ती व सदृढ आरोग्य लाभुन वर्षभर शिवरक्षाकवच प्राप्त होते. महामृत्युंजय मंत्र जपावा.

- ज्योतिष्याचार्य डॉ सुहास रोकडे
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Saturday, February 14, 2015

महाशिवरात्री के अद्भुत उपाय- डॉ सुहास रोकडे

महाशिवरात्रि पर कर सकते हैं कालसर्प दोष निवारण के ये उपाय

महाशिवरात्रि (17 फरवरी, मंगलवार) पर कालसर्प दोष निवारण के उपाय करने का विशेष फल मिलता है। ज्योतिष के अनुसार कालसर्प दोष मुख्य रूप से 12 प्रकार का होता है। किसकी कुंडली में कौन सा कालसर्प दोष है, इसकी जानकारी ज्योतिषी ही दे सकता है। प्रत्येक कालसर्प दोष के निवारण के लिए अलग-अलग उपाय हैं। आगे कालसर्प दोष के विभिन्न प्रकार व उनके निवारण के उपाय बताए गए हैं, जो इस प्रकार हैं-

1- अनन्त कालसर्प दोष

- अनन्त कालसर्प दोष होने पर महाशिवरात्रि के दिन एकमुखी, आठमुखी या नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

- यदि इस दोष के कारण स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है तो महाशिवरात्रि के दिन रांगे (एक धातु) से बना सिक्का पानी में प्रवाहित करें।

2- कुलिक कालसर्प दोष

- कुलिक नामक कालसर्प दोष होने पर दो रंग वाला कंबल अथवा गर्म वस्त्र दान करें।

- चांदी की ठोस गोली बनवाकर उसकी पूजा करें और उसे अपने पास रखें।

3- वासुकि कालसर्प दोष

- वासुकि कालसर्प दोष होने पर रात को सोते समय सिरहाने पर थोड़ा बाजरा रखें और सुबह उठकर उसे पक्षियों को खिला दें।

- महाशिवरात्रि पर लाल धागे में तीन, आठ या नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

4- शंखपाल कालसर्प दोष

- शंखपाल कालसर्प दोष के निवारण के लिए महाशिवरात्रि के दिन बादाम बहते पानी में प्रवाहित करें।

- शिवलिंग का दूध से अभिषेक करें।

5- पद्म कालसर्प दोष

- पद्म कालसर्प दोष होने पर महाशिवरात्रि के दिन से प्रारंभ करते हुए 40 दिनों तक रोज सरस्वती चालीसा का पाठ करें।

- महाशिवरात्रि के दिन जरूरतमंदों को पीले वस्त्र का दान करें और तुलसी का पौधा लगाएं।

6- महापद्म कालसर्प दोष

- महापद्म कालसर्प दोष के निदान के लिए हनुमान मंदिर में जाकर सुंदरकांड का पाठ करें।

- महाशिवरात्रि के दिन गरीब, असहायों को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा दें।

7- तक्षक कालसर्प दोष

- तक्षक कालसर्प योग के निवारण के लिए 11 नारियल बहते हुए जल में बहाएं।

- सफेद कपड़े और चावल का दान करें।

8- कर्कोटक कालसर्प दोष

- कर्कोटक कालसर्प योग होने पर बटुकभैरव के मंदिर में जाकर उन्हें दही-गुड़ का भोग लगाएं और पूजा करें।

- शीशे के आठ टुकड़े पानी में प्रवाहित करें।

9- शंखचूड़ कालसर्प दोष

- शंखचूड़ नामक कालसर्प दोष की शांति के लिए महाशिवरात्रि के दिन रात को सोने से पहले सिरहाने के पास जौ रखें और उसे अगले दिन पक्षियों को खिला दें।

- पांचमुखी, आठमुखी या नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

10- घातक कालसर्प दोष

- घातक कालसर्प के निवारण के लिए पीतल के बर्तन में गंगाजल भरकर अपने पूजा स्थल पर रखें।

- चार मुखी, आठमुखी और नौ मुखी रुद्राक्ष हरे रंग के धागे में धारण करें।

11- विषधर कालसर्प

- विषधर कालसर्प के निदान के लिए परिवार के सदस्यों की संख्या के बराबर नारियल लेकर एक-एक नारियल पर उनका हाथ लगवाकर बहते हुए जल में प्रवाहित करें।

- भगवान शिव के मंदिर में जाकर दान-दक्षिणा दें।

12- शेषनाग कालसर्प दोष

- शेषनाग कालसर्प दोष होने पर महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व रात्रि को लाल कपड़े में सौंफ बांधकर सिरहाने रखें और उसे अगले दिन सुबह खा लें।

- दूध-जलेबी का दान करें।

ज्योतिष्याचार्य
डॉ सुहास रोकडे

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Friday, February 13, 2015

मंगल परिवर्तन लाभ-हानी

23 मार्च तक मीन राशि में रहेगा मंगल, कुछ ऐसा होगा असर
आज से मंगल मीन राशि में रहेगा। 4 जनवरी से मंगल कुंभ राशि में आ गया था। अब 23 मार्च तक मीन राशि में रहेगा। मीन राशि में केतु है। इस राशि पर राहु की पूरी नजर भी है। मंगल के साथ केतु और मंगल पर राहु की नजर होने से अंगारक योग बन रहा है। अंगारक योग कुंडली में मंगल की शुभ या अशुभ स्थिति के अनुसार अच्छा-बुरा फल देता है। शत्रु, भूमि, साहस, चोट, रक्त, कर्जा, इन सबका कारक मंगल है। जिन लोगों के लिए मंगल की स्थिति शुभ रहेगी उन लोगों को 23 मार्च तक धन लाभ, प्रमोशन या कोई बड़ा फायदा मिल सकता है। जिन लोगों के लिए मंगल की स्थिति ठीक नहीं है उन लोगों को धन हानि, कर्जा, दुर्घटना या ब्लड संबंधी बीमारियों से परेशान होना पड़ सकता है।

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